Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 53, Verse 35
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 53, verse 35 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 53 · श्लोक 35
संस्कृत श्लोक
अर्जुन उवाच ।
द्वे रूपे तव देवेश परं चापरमेव च ।
कीदृशं तत्कदा रूपं तिष्ठाम्याश्रित्य सिद्धये ॥ ३५ ॥
हिन्दी अर्थ
यों भगवान् से कहे गये अर्जुन : उन दोनों रूपों की, उनकी प्राप्ति के लिए योग्य अधिकार की और
काल के विभाग की - जिज्ञासा करते हुए पूछते हैं।
अर्जुन ने कहा : हे देवेश, आपके वे पर और अपर दो रूप कैसे हैं ओर अपनी सिद्धि के लिए किस
समय किस रूप का आश्रय कर मैं स्थित रहूँ ?