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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 53, Verses 31–32

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 53, verses 31–32 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 53 · श्लोक 31

संस्कृत श्लोक

त्यागः संकल्पजालानामसंसङ्गः स कथ्यते । समस्तकलनाजालस्येश्वरत्वैकभावना ॥ ३१ ॥ गलितद्वैतनिर्भासमेतदेवेश्वरार्पणम् । अबोधवशतो भेदो नाम्नैवैषां चिदात्मनि ॥ ३२ ॥

हिन्दी अर्थ

और उससे सव संकल्पो का त्यागरूप असग सिद्ध होता है यह प्रथम प्रश्न का भी उत्तर हो चुका, यह कहते है । संकल्पसमूहों का जो त्याग हे, वही असंग (आसक्ति का अभाव) कहा गया है । (चौथे प्रश्न का उत्तर देते है) सभी संकल्प-विकल्पसमूहों में भेदावभासरहित जो ईश्वरमात्र की एक भावना है - सभी के उपादानकारण सर्वान्तर्यामी ईश्वर ही उस तरह कार्यो में प्रवृत्त कराते हें, यह सब व्यवहार उसी के विलास हैं, इस तरह की जो ईश्वर में तन्मयता की भावना है-यही (उसमें सभी व्यवहारो को समर्पित कर देना ही) ईश्वरार्पण कहा गया हे