Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 53, Verse 40
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 53, verse 40 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 53 · श्लोक 40
संस्कृत श्लोक
यदि वा वेद्यविज्ञातो भावस्तदरिमर्दन ।
तन्ममात्मानमात्मानमात्मनश्चाशु संश्रय ॥ ४० ॥
हिन्दी अर्थ
हे अरिमर्दन, यह
सगुण देव का भजन मैंने तुमसे चित्तशुद्धि के अभाव की संभावना करके ही कहा है। यदि तुम्हारा चित्त
विज्ञानैकस्वभाव ब्रह्म के ज्ञान करने के योग्य हो गया है यानी अपने चित्त को विशुद्ध हुआ मानते हो, तब
तो मुझ ईश्वर की आत्मा को (पारमार्थिकस्वरूपभूत शोधित तत्पदार्थ को) और अपनी आत्मा को
(शोधित त्वं पदार्थरूप आत्मा को) एकरसकर अखण्ड परिपूर्णात्मा का तत्काल आश्रय करो अर्थात्
इसका साक्षात्कार करके तन्निष्ठ हो जाओ