Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 53, Verse 1
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 53, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 53 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीभगवानुवाच ।
अर्जुन त्वं न हन्ता त्वमभिमानमलं त्यज ।
जरामरणनिर्मुक्तः स्वयमात्मासि शाश्वतः ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
"अपने बन्धुओं को मारनेवाला मेँ हूँ" इस प्रकार का अहन्ताभिमान तथा “ये मेरे ही बान्धव हैः
इत्यादिरूप ममताभिमान ही तुम्हारे सब दुःखो के मूल कारण है, इसलिए सर्वप्रथम उन्हें ही तुम छोड
दो, यह कते है ।
(५) तात्पर्य यह है कि १. जन्म, २-स्थिति, ३- वृद्धि, ४- विपरिणाम, ५-अपक्षय और ६-
नाश- ये छः भावविकार हैं, जो ब्रह्म में नहीं रहते इसीलिए वह (आत्मा) नित्य, कूटस्थ, असंग
आदि कहा गया है । प्रस्तुत श्लोक में यद्यपि “अज” इस विशेषण से ब्रह्म मेँ समस्त भावविकार-
शून्यता अर्थतः सिद्ध हो जाती है; तथापि शब्दतः यहाँ प्रत्येक विकार का निषेध किया गया है । वहाँ
“न जायते“ से पहले और “न म्रियते“ से अन्तिम भावविकार का ब्रह्म मेँ निषेध कर चुके; अब
मध्यपतित चार भावविकारों का निषेध करना भी प्रसंगप्राप्त है, जिसे "नाऽयम्" से कर रहे हैँ ।
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा : हे अर्जुन, अतः तुम जन्म-मरण आदि छः ऊर्मियों से निर्मुक्त हो,
अतएव नित्य हो ओर अपने भाई-बन्धुओं तथा सम्पूर्णं भूतों के स्वयं साक्षात् आत्मरूप हो, अतः
तुम किसीको मारनेवाले नहीं हो । “मे हनन करनेवाला हूँ” इस प्रकार के अभिमान को भलीर्भोति
छोड दो
सर्ग सन्दर्भ
बावनवाँ सर्ग समाप्त तिरपनवाँ सर्ग॑ अहंकार का त्याग, संगत्याग आदि का लक्षण ओर दशाओं के भेद से व्यवस्थित उपास्य और ज्ञेय का स्वरूप-इन सबका वर्णन ।