Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 53, Verse 33
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 53, verse 33 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 53 · श्लोक 33
संस्कृत श्लोक
बोधात्मा किल शब्दार्थो जगदेकं न संशयः ।
अहमाशा जगदहं स्वमहं कर्म चाप्यहम् ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
इस चिदात्मा में अज्ञान के कारण इन जीव, जगत् आदि
का नाम से ही भेद है, परमार्थतः यह नामरूपात्मक सम्पूर्ण जगत् बोधात्मक है, अत: जगत् एक ब्रह्ममय
ही हे, इसमें तनिक भी संशय नहीं हे ॥३ २॥
उसे ही दृढ़ करने के लिए भगवान् अपनी सवत्मिक विभूति का वर्णन करते हैं।
दिशाएँ मैं हूँ, जगत् मैं हूँ, कर्मो का आश्रय मैं हूँ और कर्म भी मैं ही हूँ । काल मैं हूँ, अद्वैत और
द्वैत मैं हूँ तथा अद्वैत और द्वैतरूपी अपने पर और अपर दो रूप और उनसे नियम्य जगत् मैं ही
हूँ