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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 53, Verses 36–37

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 53, verses 36–37 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 53 · श्लोक 36,37

संस्कृत श्लोक

श्रीभगवानुवाच । सामान्यं परमं चैव द्वे रूपे विद्धि मेऽनघ । पाण्यादियुक्तं सामान्यं शङ्खचक्रगदाधरम् ॥ ३६ ॥ परं रूपमनाद्यन्तं यन्ममैकमनामयम् । ब्रह्मात्मपरमात्मादिशब्देनैतदुदीर्यते ॥ ३७ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीभगवान्‌ ने कहा : हे पापशून्य अर्जुन, यह जान लो कि मेरे दो रूप हैं - एक तो सामान्य रूप यानी सर्वजनसाधारण (सुबोध) ओर दूसरा परम उत्कृष्ट यानी अशुद्ध चित्तवालों से दुरधिगम्य । हाथ आदि से युक्त, शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण करनेवाला मेरा सामान्यरूप है और जो मेरा विकारवर्जित, अद्वितीय, आदि और अन्त से रहित परमरूप है; वह ब्रह्म, आत्मा, परमात्मा आदि शब्दों से कहा जाता है