Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 53, Verse 6
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 53, verse 6 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 53 · श्लोक 6
संस्कृत श्लोक
चक्षुः पश्यतु कर्णश्च श्रृणोतु त्वक्स्पृशत्विदम् ।
रसना च रसं यातु कात्र कोऽहमिति स्थितिः ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
विचार करने पर तो रूपादि विषयों में आँख आदि इन्द्रियो की ही प्रवृत्ति है, न कि आत्मा की ।
इसलिए नेत्र आदि इन्द्रियों द्वारा किये गये कार्यो से आत्मा कर्ता नहीं कहा जा सकता, इस आशय
से कहते हैं ।
आँखें देखा करे, कान सुना करे, ये त्वचाएँ स्पर्श किया करें और जिह्वा रसास्वाद लिया करे, इनमें
(चक्षुरादि-करणकार्यसमूह में) मे कोन हूँ ? अर्थात् उनमें मद्रूप तो कोई हे ही नहीं,अतः उनमें मुझे "मे"
इस रूप से स्थिति करना युक्त नहीं हे । तात्पर्य यह है कि चक्षु आदि कार्यकरणसंघात ही सब कुछ
करनेवाला है, उसमें मद्रूप कोई है ही नहीं; अतः “मै कर्ता हूँ" यह अभिमान करना सर्वथा अयुक्त
है