Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 53, Verse 11
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 53, verse 11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 53 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
न क्वचिद्राजते कायो ममतामेध्यदूषितः ।
प्राज्ञोऽप्यतिबहुज्ञोऽपि दुःशील इव मानवः ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
प्राज्ञ होने पर भी, अतिबहुज्ञानी होने पर भी दुष्ट प्रकृति पुरुष जैसे कहीं (लौकिक या शास्त्रीय व्यवहारो
में) नहीं शोभता, वैसे ही ममतारूपी दोष से दूषित शरीर कहीं (लौकिक या शास्त्रीय प्रसंगो में) नहीं
शोभता यानी परम पुरुषार्थ के समर्थ नहीं होता