Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 53, Verses 20–21
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 53, verses 20–21 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 53 · श्लोक 20,21
संस्कृत श्लोक
अर्जुन उवाच ।
सङ्गत्यागस्य भगवंस्तथा ब्रह्मार्पणस्य च ।
ईश्वरार्पणरूपस्य संन्यासस्य च सर्वशः ॥ २० ॥
तथा ज्ञानस्य योगस्य विभागः कीदृशः प्रभो ।
क्रमेण कथयैतन्मे महामोहनिवृत्तये ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
इस तरह उपदेश प्राप्त कर चुके अर्जुन, तत्-तत् लक्षणों से संग और त्याग आदिका विभाग
जानने के इच्छुक होकर पूछते हैं।
अर्जुन ने कहा : भगवन्, संग-त्याग का, ब्रह्मार्पण का, ईश्वारार्पणरूप का, सर्वथासंन्यास का
तथा ज्ञान और योग का विभाग कैसा है ? हे प्रभो, मेरे महामोह की निवृत्ति के लिए यह सब क्रमशः
कहिए