Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 53, Verse 16
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 53, verse 16 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 53 · श्लोक 16
संस्कृत श्लोक
योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनंजय ।
निःसङ्गस्त्वं यथाप्राप्तकर्मवान्न निबध्यसे ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
राज्यलाभ आदि लोभप्रयुक्त युद्ध मे "लोभमूलानि पापानि रसमूलास्तथा मयाः“ इस न्याय से
कदाचित् अधर्म की प्रसक्ति हो भी सकती है; परंतु योग में - जो कि सिद्धि ओर असिद्धि में समभाव
रहना ही है-स्थित हुए योगी की तो फल में आसक्ति न रहने से प्रसक्ति ही नहीं है इसलिए उस
योगस्थिति का भगवान् उपदेश देते हैं।
हे धनंजय, ब्रह्मभावापन्न होकर, संग का त्यागकर तुम कर्मो को करो, क्योकि आसक्तिरहित
होकर यथाप्राप्त कर्म करनेवाला उनके फलों से निबद्ध नहीं होता