Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 53, Verses 62–63
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 53, verses 62–63 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 53 · श्लोक 62
संस्कृत श्लोक
नानातरङ्गवृन्दानि यथा लोलानि वारिणि ।
कटकादीनि वा हेम्नि भूतान्येवं परात्मनि ॥ ६२ ॥
पदार्थजातं भूतानि बृहद्ब्रह्म च भारत ।
एकमेवाखिलं विद्धि पृथक्त्वं न मनागपि ॥ ६३ ॥
हिन्दी अर्थ
जिस प्रकार जल
में नाना प्रकार के चंचल तरंगसमूह रहते हैं या सुवर्ण मेँ कटक आदि रहते हैं, उसी प्रकार परमात्मा में ये
समस्त भूत भी रहते हैं