Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 53, Verse 64
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 53, verse 64 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 53 · श्लोक 64
संस्कृत श्लोक
किं तद्भावविकाराणां गम्यमस्ति जगत्त्रये ।
क्व ते वापि जगत्किं वा किं मुधा परिमुह्यसि ॥ ६४ ॥
हिन्दी अर्थ
हे भारत, भूत आदि सम्पूर्णं पदार्थ ओर वृहद् ब्रह्म-इन सबको, दर्पण
तथा उसमें के प्रतिबिम्ब की नाई, एकरूप ही जानो; इनमें लेशमात्र भी पृथक्त्व नहीं है ॥६ ३॥ हे पार्थ,
तीनों जगत् में जब एकमात्र निर्विकार ब्रह्म ही है, तब जन्म आदि भावविकारों का आश्रयभूत दूसरा क्या
हे ? अथवा तुम्हारे बन्धुवध आदि भावविकार भी कहाँ है ? किंवा यह जगत् भी ब्रह्म को छोडकर दूसरा
क्या है ? अर्थात् कुछ नहीं हे । अतः तुम व्यर्थ ही इनमें मोह क्यों करते हो ?