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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 53, Verse 14

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 53, verse 14 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 53 · श्लोक 14

संस्कृत श्लोक

अपि कुत्सितमप्यन्यदप्यधर्ममयक्रमम् । श्रेष्ठं ते स्वं यथा कर्म तथेहामृतवान्भव ॥ १४ ॥

हिन्दी अर्थ

तब तो बन्धुवध से अतिरिक्त द्रोण, भीष्म, कृपाचार्य आदि गुरुजन का वधरूप जो कुत्सित कर्म है, वह भला मुझसे कैसे किया जा सकता है ? इस प्रकार की गुरुवध में हुई अर्जुन की अधर्मत्वशंका का सत्यशपथग्रहणपूर्वक आशीर्वाद देते हुए निवारण कर रहे भगवान्‌ कहते है । और दूसरा भी यानी पूजनीय महानुभावं के ऊपर उनके विरुद्ध शस्त्र उठाना आदि अधर्मप्रचुरक्रम से युक्त कुत्सित भी तुम्हारा युद्धकर्म, जैसे यानी जिस सत्यस्वरूप शास्त्रप्रामाण्य से श्रेष्ठ है, वैसे ही यानी उसी सत्य से तुम इस युद्ध मेँ अमरणधर्मा विजयी बन जाओ