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Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 34

तेंतीसवाँ सर्ग समाप्त चौतीसवाँ सर्ग श्रीहरि के वर से सुविचार को प्राप्त कर तथा अनात्मवर्ग का त्याग कर प्रह्नाद का अपने अद्वितीय सच्चिदात्मस्वरूप का दर्शन ।

54 verse-groups

  1. Verse 1श्रीभगवान ने कहा : हे देत्यकुल के चूडामणिरूप, हे गुणसागर, पुनः जन्म रूपी दुःख की निवृत्ति…
  2. Verse 2प्रह्लाद ने कहा : हे प्रभो, आप सब संकल्पो का फल देनेवाले हैं और सब प्राणियों के हृदय में…
  3. Verse 3इस प्रकार प्रार्थना करने पर भगवान्‌ विष्णु अपने विचार से उत्पन्न आत्मतत्व साक्षात्कार के…
  4. Verse 4श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, दैत्यराज प्रह्लाद से यह कहकर जैसे कलकल ध्वनि कर…
  5. Verses 5–7भगवान विष्णु के अन्तर्हित होने पर प्रह्नाद ने पूजा में मणि-रत्नों से सुशोभित अन्तिम पुष्प…
  6. Verse 8सारा दृश्य आत्मा के लिए है, इसलिए आत्मा ही प्रधान है, यह निश्चय कर वह आत्मा कौन है, ऐसा व…
  7. Verse 9देह से बाह्मवस्तु तो आत्मा हो नहीं सकती, ऐसा कहते हैं । वृक्ष, तृण, पर्वत आदि से युक्त यह…
  8. Verse 10देह भी मैं नहीं हूँ, ऐसा कहते हैं। वस्तुतः असत्‌ होता हुआ भी उदित, जड़ होने के कारण ही बो…
  9. Verse 11इस प्रकार शब्द आदि विषय भी मैं नहीं हूँ, ऐसा कहते हैं। जड़ (अचिद्रूप) कर्णच्छिद्र द्वारा…
  10. Verses 12–16क्षण में नष्ट होनेवाली त्वगिन्द्रिय से प्राप्त करनेवाला (चेतन के अधीन सिद्धिवाला) अचेतन स…
  11. Verse 17शब्द आदि विषयों को अनात्म कहना वचन, ग्रहण आदि में भी समान होकर सर्वत्र त्रिपुटियों के अना…
  12. Verse 18इस प्रकार परिशुद्ध त्वपदार्थ का विचारकर उसके द्वारा ही तत्पदार्थ का भी शोधन करके उसको समझ…
  13. Verse 19हाँ, इस सारे सत्य का मुझे अब स्मरण हो आया हे । आकाश आदि विकल्पों से रहित चिद्रूप प्रकाश स…
  14. Verse 20भीतर प्रकाशमान तेजरूप इसी से इन विचित्र इन्द्रियवृत्तियों का स्फुरण होता है जो कि भीतर प्…
  15. Verse 21जैसे ग्रीष्म ऋ्तु से मरुमरीचिकाओं का (मृगतृष्णाओं का) स्फुरण होता है वैसे ही सर्वव्यापक इ…
  16. Verse 22सब पदार्थो की स्फूर्ति के समान सत्ता भी इसके अधीन ही है, ऐसा कहते है । जैसे वस्त्रं का अप…
  17. Verses 23–24जैसे ग्रहण सब प्रतिबिम्बं का विश्रान्ति स्थान हे । उसी एक विकल्परहित चिद्रूपी दीपक के प्र…
  18. Verse 25“आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल' इत्यादि क्रम से श्रुति और प्रत्यक्ष द्वारा अनु…
  19. Verses 26–29पूर्वोक्त नेरन्तर्य क्रम से अनुभूत सब पदार्थो का जैसे ग्रीष्म ऋतु के सूर्य के सन्ताप से भ…
  20. Verses 30–35कारण होने से जैसे यह हरि का हेतु है वैसे ही पालन ओर संहार का हेतु भी है, ऐसा कहते है । नि…
  21. Verses 36–37कारण में सूक्ष्मरूप से स्थित इस समय वर्तमान भी जिसका इस चेतन अन्तरात्मा ने यह उत्तर क्षण…
  22. Verse 38इसी में कल्पना है, यह कैसे जाना ? ऐसी यदि कोई शंका करे, तो जगत्‌ की स्फूर्ति इससे भिन्न ह…
  23. Verses 39–40जन्म और विनाश रहित सर्वव्यापक यह एक मैं सब चराचर भूतो के अन्दर स्वानुभवरूप स्थित हूँ। इस…
  24. Verses 41–42अनुभूति स्वरूप एक यह अपना अनुभूतिवश स्वयं सर्वद्रष्टा, सर्वद्रश्य ओर सर्वदर्शन एवं हजारों…
  25. Verse 43यह प्रत्यक्ष ईश्वरभूत मैं सुन्दर सूर्यरूप होकर आकाश में विचरण करता हूँ एवं वायु रूप होकर…
  26. Verse 44इस जगत्‌ मे सदा पद्मासन आसीन होकर निर्विकल्प समाधि में स्थित परम सुख को प्राप्त मैं ब्रह्…
  27. Verses 45–46मैं तीन नेत्रवाली आकृति से श्रीपार्वतीजी के मुखकमल का भ्रमर बनकर जैसे कछुआ अपने अंगो को स…
  28. Verse 47त्वं स्त्री त्वं पुमानसि त्वं कुमार उत वा कुमारी। त्वं जीर्णो दण्डेन वंचसि त्वं जातो भवसि…
  29. Verse 48मैं जीवसाररूप से स्थित होकर तृण, लता, झाड़ी आदि के समूह को चिद्रूप भूमि से ऐसे उत्पन्न कर…
  30. Verse 49सुन्दर बालकरूप मैंने इस सुन्दर जगद्रूपी आडम्बर का मिट्टी के खिलौने के समान अपनी क्रीडा के…
  31. Verse 50मुझसे कारणरूप से यह जगत्‌ व्याप्त किया जाता है। मुझे ही प्राप्त होकर यह सत्ता को प्राप्त…
  32. Verse 51मुझ विशाल चिद्रूपी दर्पण में जो प्रतिबिम्ब प्राप्त हुआ है, वह मुझसे पृथक्‌ नहीं है, क्यों…
  33. Verses 52–58अब इश्वरूप अपने विभूति विस्तार का वर्णन करते हैं। मैं फूलों मे सुगन्ध हूँ, फूलों की पंखुड…
  34. Verse 59इन्द्र से बढ कर राज्य की प्राप्ति हुए बिना आपकी सम्राटता कैसी ? ऐसी यदि कोई शंका करे, तो…
  35. Verse 60अहो, मैं तो विस्तृत आत्मावाला हू, अतएव मैं अपने आप अपने आत्मा में, कोठिले में धानों की भा…
  36. Verses 61–62जैसे कुण्ठित गतिवाला साँप क्षीरसागर मेँ चलता हुआ उसका अन्त नहीं पाता वैसे ही अपने ही अन्द…
  37. Verses 63–65उत्तर-उत्तर दस गुने विशाल पृथिवी, जल आदि आवरणं से आवृत ब्रह्माण्ड रूप ब्रह्मा के घर से आग…
  38. Verses 66–71अब असत्य साम्राज्य मे आसक्त हुए अपने पिता, पितामह आदि पूर्वजों के लिए शोक करते हैं। मेरे…
  39. Verses 72–75भूतल में, जहाँ पर वनदुर्ग में लकड़ियाँ, जलदुर्ग में जल और गिरिदुर्ग में पत्थर विपत्तियं क…
  40. Verses 76–90एक की प्राप्ति से ही विषय के बिना ही सव विषययुखों की प्राप्ति होती है, ऐसा कहते है । जिसे…
  41. Verses 91–92विचित्र पदार्थो की विचित्र प्रभा दिखाई देती है, ऐसी अवस्था मे चित्‌ की समता कैसे ? इस पर…
  42. Verse 93दिशा और काल के भेद से उत्पन्न वैषम्य भी उसमें नहीं है, ऐसा कहते हैं। जैसे सूर्य की प्रभा…
  43. Verses 93–94देश और काल के भेद स्वप्नदेश और स्वप्नकाल की दीर्घता के तुल्य अभिन्न कालवाले चैतन्य से ही…
  44. Verse 95अतएव कालभेद और वृत्तिभेद होने पर उसके साक्षी चैतन्य का भेद नहीं है, इसलिए उसमें पूर्णता ह…
  45. Verse 96अतएव दो मधुर रसो का अथवा दो तीखे रसो का एक ही समय स्वाद लेने पर विषय का भेद रहने पर भी अन…
  46. Verses 97–98घट, पट आदि विचित्र पदार्थ शोभा भी अन्योन्य के व्यावर्तक भेद संकल्पकला का त्याग की हुई, सू…
  47. Verse 99भेदसंकल्पकला के त्याग का उपाय कहते हैं। चित्त से वाचारम्भण श्रुति द्वारा, "नेति नेति" इत्…
  48. Verse 100उक्त अर्थ का प्रकारान्तर से उपपादन करते हैं । वर्तमान चेत्य की (दृश्य की) उपेक्षा करनेवाल…
  49. Verse 101उक्त चिति वाणी व्यवहार के अगोचर होने से शाश्वत असत्ता को प्राप्त-सी होती है । नैरात्म्यसि…
  50. Verse 102जो (चित्‌) स्थित है वह शास्त्रीय व्यवहार में प्रत्यक्‌ होने के कारण आत्मा है तथा बृहत्‌ ह…
  51. Verses 103–104इस प्रकार भेदसंकल्प की कल्पना का त्याग उपायपूर्वक कहा। एवं कल्प की कल्पना में चिति की मन्…
  52. Verses 105–110गिरते | सब जीव इच्छाद्वेष से उत्पन्न द्वन्द मोह से यानी सुखदुःख, शीत-उष्ण आदि के उपार्जन…
  53. Verses 111–112केवल सत्यज्ञान से इष्टानिष्ट कल्पनारूप मृगतृष्णा का कैसे नाश हो सकता है ? ऐसा यदि कोर्ड क…
  54. Verses 113–115हे भगवन्‌, चिरकाल तक मैंने आपका विचार किया है, आपको प्राप्त किया है, अपने पारमार्थिकरूप स…