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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 34, Verses 61–62

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 34, verses 61–62 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 34 · श्लोक 61,62

संस्कृत श्लोक

नात्मन्यन्तमवाप्नोमि स्वस्थेऽन्तः स्वदिते स्वयम् । क्षीरवारिनिधौ पङ्गुः सरीसृप इव स्फुरन् ॥ ६१ ॥ स्वल्पेयं मठिका ब्राह्मी जगन्नाम्नी सुसंकटा । गजो बिल्व इव स्वाङ्गे न माति विपुलं वपुः ॥ ६२ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे कुण्ठित गतिवाला साँप क्षीरसागर मेँ चलता हुआ उसका अन्त नहीं पाता वैसे ही अपने ही अन्दर निरतिशय आनन्दरूप से स्वाद में आ रहे स्वस्थ आत्मा में मैं अन्त नहीं पाता हू । यह जगन्नामक ब्रह्माण्ड, जिसका भीतर का भाग संकुचित हे, बड़ा छोटा है, इसलिए जैसे बेल के फल के अन्दर हाथी नहीं समा सकता वैसे ही मेरा विशाल शरीर इसमें नहीं समा सकता हे