Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 34, Verses 26–29
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 34, verses 26–29 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 34 · श्लोक 26-29
संस्कृत श्लोक
सातत्येनानुभूतानां पदार्थानामनेन तत् ।
पदार्थत्वमुदेत्युच्चैः प्रतापेनेव तप्तता ॥ २६ ॥
अनाकारात्कारणाच्च सर्वकारणकारणात् ।
एतस्मादिदमुत्पन्नं जगच्छैत्यं हिमादिव ॥ २७ ॥
ब्रह्मविष्ण्विन्द्ररुद्राणां कारणानां जगत्स्थितौ ।
एतत्कारणमाद्यं तत्कारणं नास्य विद्यते ॥ २८ ॥
चिच्चेत्यद्रष्टदृश्यादिनामभिर्वर्जितात्मने ।
स्वयं सकृद्विभाताय मह्यमस्मै नमो नमः ॥ २९ ॥
हिन्दी अर्थ
पूर्वोक्त नेरन्तर्य क्रम से अनुभूत सब पदार्थो का जैसे ग्रीष्म ऋतु के सूर्य के सन्ताप से भूमि आदि
की अत्यन्त सन्तप्तता उत्पन्न होती हे वैसे ही इसी से प्रसिद्ध आकाश आदि पदार्थत्व होता हे । जैसे
बर्फ से शीतलता उत्पन्न होती है वैसे ही वस्तुतः निराकार यानी कारणत्व आदि आकार से शून्य और
विद्या से कारणभूत सब कारणों के कारण इससे यह दृश्य उत्पन्न हुआ हे । जगत् में उत्पत्ति आदि की
व्यवस्था में कारणभूत ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र और रुद्र का यही आदिकारण हे । इसका कोई कारण नहीं हे ।
चित्, चेत्य, द्रष्टा, दृश्य आदि नामों से वर्जित स्वरूपवाले स्वयं नित्य स्वप्रकाश इस मुञ्च प्रत्यक् चैतन्य
को बार-बार नमस्कार है