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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 34, Verses 36–37

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 34, verses 36–37 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 34 · श्लोक 36,37

संस्कृत श्लोक

इयमभ्युदयं याति नानादृश्यसुमञ्जरी । आचारचञ्चरीकाढ्या एतस्मात्कारणद्रुमात् ॥ ३६ ॥ अस्मादियमुदेत्युच्चैः संसाररचनाचला । विचित्रतरुगुल्माढ्या शैलादिव वनावली ॥ ३७ ॥

हिन्दी अर्थ

कारण में सूक्ष्मरूप से स्थित इस समय वर्तमान भी जिसका इस चेतन अन्तरात्मा ने यह उत्तर क्षण में उत्पन्न हो, ऐसा संकल्प किया वही सर्वत्र उत्तर क्षण में उत्पन्न होता है, अन्य नहीं ॥ ३ १॥ जिस वस्तु को चेतन ने अपनी सत्ता ओर स्फूर्ति के प्रदान द्वारा उज्जीवित किया, वही अपने “घट है * इत्यादि व्यवहारपद को प्राप्त होता है ओर जिसको चेतन ने अपनी सत्ता ओर स्फूर्ति के प्रदान द्वारा उज्जीवित नहीं किया, वह असत्त्वरूप नाश को प्राप्त हुआ हे । ये घटपटाकार जगत्‌ के सैकड़ों पदार्थ विशाल दर्पणरूप इस चिदाकाश में प्रतिबिम्बित हैं ॥३ २, ३ ३॥ इसी प्रकार वृद्धि आदि भावविकार भी इसी में अध्यस्त हैं, ऐसा कहते हैं। जैसे प्रतिबिम्बित सूर्य में क्षय और वृद्धि प्रतिबिम्बरूप से स्थित सूर्य में ही अध्यस्त होकर अन्य वृत्तियाँ प्रतीत होती हैं वैसे ही यह भी विशाल पदार्थ में विशाल, विनष्ट होनेवाले पदार्थ में विनाशी और सत्‌-असत्रूप से स्थित है। सब अज्ञानी प्राणियों के दर्शन के अयोग्य जिनका चित्त विलीन हो चुका, ऐसे महात्माओं को प्राप्त होने योग्य यह अति निर्मल परमाकाश सत्पुरुषो द्वारा देखा जाता है ॥ ३ ४, ३५॥ जो लोग कारण के एक देश में परिणामरूप जगत्‌ है, ऐसी कल्पना करते हैं, उनकी कल्पना भी इसी परमाकाश में है अन्य में नहीं है, इसी आशय से कहते हैं। आचाररूपी भौरों से वेष्टित यह विविध दृश्यरूपी सुन्दर मंजरी इसी कारणरूप वृक्ष से उत्पन्न होती है। जैसे विविध प्रकार के वृक्ष आडी ओर लताओं द्वारा वेष्टित वनपंक्ति पर्वत से उत्पन्न होती है वैसे ही यह चंचल विशाल संसार रचना इसी से उत्पन्न होती है