Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 34, Verses 76–90
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 34, verses 76–90 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 34 · श्लोक 76-90
संस्कृत श्लोक
न किंचिद्येन संप्राप्तं तेनेदं परमामृतम् ।
संप्राप्यान्तः प्रपूर्णेन सर्वं प्राप्तमखण्डितम् ॥ ७६ ॥
त्यक्त्वा पदमिदं मूर्खो मितमेति न पण्डितः ।
उष्ट्रो हि त्यक्तसुलतः कण्टकं याति नेतरः ॥ ७७ ॥
परां दृष्टिमिमां त्यक्त्वा दग्धराज्ये रमेत कः ।
कस्त्यक्त्वेक्षुरसं प्राज्ञः कटु निम्बपयः पिबेत् ॥ ७८ ॥
मूर्खा एव हि ते सर्वे बभुवुर्मे पितामहाः ।
इमां दृष्टिं परित्यज्य रेमिरे राज्यसंकटे ॥ ७९ ॥
क्व फुल्लानन्दनस्थल्यः क्व दग्धमरुभूमयः ।
क्वेमा बोधदृशः शान्ताः क्व भोगेष्वात्मबुद्धयः ॥ ८० ॥
न किंचिदपि त्रैलोक्ये यद्राज्यमपि वाञ्छते ।
सर्वमस्त्येव चित्तत्त्वे तत्कस्मान्नानुभूयते ॥ ८१ ॥
चिता सर्वस्थया स्वस्थसमया निर्विकारया ।
सर्वया सर्वदा सर्वं सर्वतः साधु लभ्यते ॥ ८२ ॥
भासिनी तैजसी शक्तिरमृतप्राप्तिरैन्दवी ।
ब्राह्मी महत्ता महती शाक्री त्रैलोक्यराजता ॥ ८३ ॥
परमा पूर्णता शार्वी जयलक्ष्मीश्च वैष्णवी ।
मानसी शीघ्रगतिता बलवत्ता च वायवी ॥ ८४ ॥
आग्नेयी दाहकलना पायसी रसनिर्वृतिः ।
मौनी महातपःसिद्धिर्विद्या बार्हस्पती तथा ॥ ८५ ॥
वैमानिकी व्योमगतिः स्थिरता चापि पार्वती ।
गम्भीरताथ सामुद्री मैरवी च महोन्नतिः ॥ ८६ ॥
शमश्रीः सौगती सौम्या मादिरी मदलोलता ।
माधवी पुष्पमयता वार्षिकी घनशब्दिता ॥ ८७ ॥
याक्षी च मायामयता नाभसी निष्कलङ्कता ।
शीततापि च तौषारी नैदाघी तापतप्तता ॥ ८८ ॥
एताश्चान्यास्तथा बह्वयो देशकालक्रियात्मिकाः ।
नानाकारविकारोत्थास्त्रिकालोदरसंस्थिताः ॥ ८९ ॥
विचित्राः शक्तयः स्वस्थसमया निर्विकारया ।
चिता क्रियन्ते परया कलाकलनयुक्तया ॥ ९० ॥
हिन्दी अर्थ
एक की प्राप्ति से ही विषय के बिना ही सव विषययुखों की प्राप्ति होती है, ऐसा कहते है ।
जिसे कुछ भी प्राप्त नहीं हुआ, इस परम अमृत को पाकर पूर्ण अन्तःकरणवाले हुए उसको यह सब
निरन्तर प्राप्त हो गया । मूर्ख इस परमपद को त्यागकर परिमित पदार्थ को प्राप्त होता है ज्ञानी नहीं ।
ऊँट ही सुन्दर लता का त्यागकर काँटों की ओर जाता है अन्य नहीं । इस परम दृष्टि का त्याग कर इस
गर्हित राज्य में किसको प्रीति होगी ? कौन बुद्धिमान् पुरुष ईख के रस का त्याग कर नीम के पत्तो का
कडवा रस पीयेगा ? सचमुच मेरे पिता, पितामह सब मूर्ख ही रहे, जिन्होंने इस दृष्टि का त्यागकर
राज्यरूपी विपत्ति में प्रीति की। कहाँ फूली हुई नन्दनवन सी स्थलियाँ, कहाँ सन्तप्त मरुभूमियाँ, कहाँ
शान्त ये ज्ञानदृष्टियाँ और कहाँ भोगायतन शरीरादि में आत्मबुद्धि ? त्रैलोक्य में राज्य को प्राप्तकर
कुछ भी सुख नहीं मिलता है फिर भी उसे ही पुरुष चाहता है, किन्तु चित्त तत्त्व में तो सब कुछ निहित है,
उसका ज्ञान क्यों नहीं करता ? सबमें स्थित, स्वस्थ और सम, निर्विकार, सर्वरूप चित् से सदा सब
जगह सुख के साधन खुशी से प्राप्त होते हें । तेज की भासनशक्ति, चन्द्र की अमृतप्राप्ति, हिरण्यगर्भ
की सर्वमान्यता, इन्द्र की सर्वोत्कृष्ट त्रैलोक्यराजता, शिवजी की निरतिशय ज्ञान, ऐश्वर्य, आनन्द
शक्ति पूर्णता, विष्णु की जयलक्ष्मी, मन की शीघ्रगतिता, वायु की बलवत्ता, अग्नि की दाहकता,
जलकी आप्ययकता, भृगु आदि मुनियों की महातपःसिद्धि, बृहस्पति की विद्या, विमानों की आकाशगति,
पर्वतो की स्थिरता, समुद्र की गम्भीरता, मेरु पर्वत की महोन्नतता, बौद्ध सिद्धान्त में सिद्ध शून्यतारूप
सर्व उपद्रव शान्ति या ब्रह्मसाक्षात्कार सम्बन्धिनी सर्व अनर्थनिर्वाणशक्ति, मदिरा की मदचंचलता,
वसन्त ऋतु की पुष्पमयता, वर्षा ऋतु की मेचशब्दता, यक्षो की मायामयता, आकाश की निर्मलता,
हिम की शीतलता, ग्रीष्म ऋतु की तप्तता ये ओर इनसे अतिरिक्त अन्यान्य बहुत-सी देश, काल ओर
क्रियारूप नाना आकार विकारों से उत्पन्न, भूत, भविष्यत् और वर्तमान तीनों लोकों के अन्दर स्थित
विचित्र शक्तियों का स्वस्थ, सम निर्विकार परमचैतन्य द्वारा, जो तत्-तत् शक्ति के कार्य के अनुसन्धान
से युक्त है, निर्माण किया जाता हे