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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 34, Verse 17

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 34, verse 17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 34 · श्लोक 17

संस्कृत श्लोक

चेत्यवर्जितचिन्मात्रमहमेषोऽवभासकः । सबाह्याभ्यन्तरव्यापी निष्कलामलसन्मयः ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

शब्द आदि विषयों को अनात्म कहना वचन, ग्रहण आदि में भी समान होकर सर्वत्र त्रिपुटियों के अनात्मत्व का उपलक्षक है, क्योकि सर्वत्र न्याय समान है, इससे अहंकार, मन, बुद्धि, चित्त त्रिपुटी का भी अनात्मरूप से निरास होने पर शुद्ध चिन्मात्र ही आत्मा परिशिष्ट रहता है, इस आशय से कहते है। “मम” इस प्रकार के अभिमान से रहित, मननरूप मन के व्यापार से शून्य माया के सम्बन्ध से रहित, पंचेन्द्रियों के भ्रम से शून्य (पंचेन्द्रियतादात्म्य भ्रान्तिरहित) शान्त शुद्ध चेतन ही मैं हूँ। चेतन पद से चेतनावान जड़ांश का भी ग्रहण न हो, उसके शोधन के लिए कहते है । स्वयं ज्योति, सबका प्रकाशक, बाह्य ओर आभ्यन्तर सर्वत्र व्यापक, अखण्ड निर्मल, सन्मय यह मैं चेत्यरहित चिन्मात्र ही हू