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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 34, Verses 66–71

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 34, verses 66–71 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 34 · श्लोक 66-71

संस्कृत श्लोक

वराकाः पेलवधियो बभूवुर्मे पितामहाः । ये साम्राज्यमिदं त्यक्त्वा रेमिरे भवभूमिषु ॥ ६६ ॥ क्वेयं किल महादृष्टिर्भरिता ब्रह्मबृंहिता । क्व सरीसृपभीमाशा भीमा राज्यविभूतिभिः ॥ ६७ ॥ अनन्तानन्दसंभोगा परोपशमशालिनी । शुद्धेयं चिन्मयी दृष्टिजयत्यखिलदृष्टिषु ॥ ६८ ॥ सर्वभावान्तरस्थाय चेत्यमुक्तचिदात्मने । प्रत्यक्चेतनरूपाय मह्यमेव नमो नमः ॥ ६९ ॥ जयाम्यहमजो जातो जीर्णसंसारसंसृतिः । प्राप्तप्राप्यो महात्मायं जीवामि च जयामि च ॥ ७० ॥ इदमुत्तमसाम्राज्यं बोधं संत्यज्य शाश्वतम् । न रमेऽहमरम्यासु राज्यदुःखविभूतिषु ॥ ७१ ॥

हिन्दी अर्थ

अब असत्य साम्राज्य मे आसक्त हुए अपने पिता, पितामह आदि पूर्वजों के लिए शोक करते हैं। मेरे पिता, पितामह आदि बेचारे मन्दमति थे, जो इस साम्राज्य का त्याग कर भवभूमि में अनुरक्त हुए। कहाँ ब्रह्मा से बढ़ी हुई पूर्ण यह महादृष्टि और कहाँ साँपों की नाईं भयंकर आशाओं से भीषण राज्य विभूतियाँ | यह शुद्ध चिन्मय दृष्टि, जिसमें अनन्त आनन्द का भोग प्राप्त होता है और जो परम शान्ति देनेवाली है, सब दृष्टियों से बढ़कर है । सब पदार्थों के अन्दर विद्यमान चेत्यरहित चिदात्मारूप प्रत्यक्‌ चेतनस्वरूप मुझको बार-बार नमस्कार हे । चूकि चिरभुक्त अन्न के समान जिसने संसार सरणि को जीर्णं कर दिया है, ऐसा मैं आज हो गया हूँ। अतएव चारों ओर से चेत्य के जय के फलरूप सर्वअनर्थनिवृत्ति को प्राप्त हो गया हूँ ओर प्राप्त सब सुखो को प्राप्त हुए मेरा जीवन सफल हो गया है, अतएव मेँ सर्वोत्कृष्टरूप से विराजमान हू । नित्यबोधरूप इस उत्तम साम्राज्य का त्यागकर अरमणीय राज्य के विविध दुःखों में मुझे आनन्द नहीं मिलता