Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 34, Verses 5–7
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 34, verses 5–7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 34 · श्लोक 5-7
संस्कृत श्लोक
विष्णावन्तर्हिते देवे पूजायां कुसुमाञ्जलिम् ।
पाश्चात्यं दानवस्त्वक्त्वा मणिरत्नपरिष्कृतम् ॥ ५ ॥
पद्मासनस्थोऽतिमुदा ह्युपविश्य वरासने ।
स्तोत्रपाठविधावन्तश्चिन्तयामास चेतसा ॥ ६ ॥
विचारवानेव भवान्भवत्विति भवारिणा ।
देवेनोक्तोऽस्मि तेनान्तः करोम्यात्मविचारणम् ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
भगवान विष्णु के अन्तर्हित
होने पर प्रह्नाद ने पूजा में मणि-रत्नों से सुशोभित अन्तिम पुष्पांजलि देकर, सुन्दर आसन पर बैठकर,
पद्मासन लगाकर स्तोत्रपाठ करने के समय बड़े हर्ष से अपने अन्तःकरण में विचार किया । जन्ममरणरूपी
संसार से छुटकारा देनेवाले भगवान् ने तुम विचारवान् ही होओ, ऐसा मुझे उपदेश दिया है । इसलिए मैं
अपने अन्तःकरण में आत्मविचार करता हूँ