Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 34, Verse 47
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 34, verse 47 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 34 · श्लोक 47
संस्कृत श्लोक
स्त्रीपुमानहमेवैतत्कुमारो ह्यहमित्यपि ।
जीर्णोऽहं देहधारित्वाज्जातोऽहं विश्वतोमुखः ॥ ४७ ॥
हिन्दी अर्थ
त्वं स्त्री त्वं पुमानसि त्वं कुमार उत वा कुमारी।
त्वं जीर्णो दण्डेन वंचसि त्वं जातो भवसि विश्वतोमुखः ॥
इस श्रुति का अपने अनुभव द्वारा अपने में समन्वय करते है ।
यह मैं ही स्त्री हूँ, मैं ही पुरुष हूँ, कुमार भी मैं ही हूँ, देहधारी होने से मैं जीर्ण हो गया हूँ और मैं ही
सर्वतोमुख विराट् पुरुष हूँ