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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 34, Verse 96

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 34, verse 96 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 34 · श्लोक 96

संस्कृत श्लोक

तुल्यकालावबुद्धेन स्वादुना कटुनापि चित् । समेन समतामेति मधुनिम्बानुभूतिवत् ॥ ९६ ॥

हिन्दी अर्थ

अतएव दो मधुर रसो का अथवा दो तीखे रसो का एक ही समय स्वाद लेने पर विषय का भेद रहने पर भी अनुभव का भेद नहीं होता, इसलिए विषय आदि का भेद वित्‌ के भेद का प्रयोजक नहीं है, ऐसा कहते हैं। शहद और नींबु आदि प्रत्येक की अनुभूति के समान एक काल में अनुभूत तुल्य रसवाले दो मधुर रसों से और दो कड़वे रसों से भी चिति समता को ही प्राप्त होती है यानी उनसे चिति में भेद नहीं होता है