Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 34, Verses 12–16
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 34, verses 12–16 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 34 · श्लोक 12-15
संस्कृत श्लोक
त्वचा क्षणविनाशिन्या प्राप्यमप्राप्यमप्यथ ।
चित्प्रसादोपलब्धात्मस्पर्शनं नास्म्यचेतनम् ॥ १२ ॥
बद्धात्मा जिह्वया तुच्छो लोलया लोलसत्तया ।
स्वल्पस्पन्दो द्रव्यनिष्ठो रसो नाहमचेतनः ॥ १३ ॥
दृश्यदर्शनयोर्लीनं क्षयिक्षणविनाशिनोः ।
केवले द्रष्टरि क्षीणं रूपं नाहमचेतनम् ॥ १४ ॥
नासयाप्यन्धजडया क्षयिण्या परिकल्पितः ।
पेलवोऽनियताकारो गन्धो नाहमचेतनः ॥ १५ ॥
निर्ममोऽमननः शान्तो गतपञ्चेन्द्रियभ्रमः ।
शुद्धचेतन एवाहं कलाकलनवर्जितः ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
क्षण में नष्ट होनेवाली त्वगिन्द्रिय से प्राप्त करनेवाला (चेतन के अधीन सिद्धिवाला)
अचेतन स्वरूप स्पर्श भी मैं नहीं हूँ । अनित्य, चंचल जिह्वा से संबद्ध स्वभाववाला यानी रसनेन्द्रिय के
अधीन रिद्धिवाला, द्रव्य में रहनेवाला, अचेतन तुच्छ रस, जिह्ना के अग्रभाग से लेकर कण्ठ तक जिसके
आस्वाद का प्रसार है, मैं नहीं हूँ क्षणविनाशी पदार्थ ओर चक्षु इन दोनों के अधीन सिद्धिवाला अतएव
विनश्वर तथा केवल द्रष्टा मेँ अविद्यमान अचेतन रूप मैं नहीं हू । गन्धवती, जड़, नष्ट होनेवाली
नासिका (प्राणेन्द्रिय) द्वारा कल्पित, (दूसरे क्षण में अन्य गन्ध का प्रादुभार्व होने से) अनियत आकारवाला
ओर अचेतन तुच्छ गन्ध भी मैं नहीं हू