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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 34, Verses 91–92

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 34, verses 91–92 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 34 · श्लोक 91,92

संस्कृत श्लोक

विकल्पहीना चित्सर्वा पदार्थशतदृष्टिषु । सममेवाभिपतति प्रभा प्राभाकरी यथा ॥ ९१ ॥ सर्वाशाकोशविश्रान्तां पदार्थपटलीं महीम् । कालत्रयेहाकलितां यथानुभवति क्षणात् ॥ ९२ ॥

हिन्दी अर्थ

विचित्र पदार्थो की विचित्र प्रभा दिखाई देती है, ऐसी अवस्था मे चित्‌ की समता कैसे ? इस पर कहते हैं। जैसे सूर्य की प्रभा वृत्ति से किये गये स्थाणु, पुरुष इत्यादि विकल्पों से रहित हो सब पदार्थों में समान रूपसे गिरती है वैसे ही सब वृत्तियों में प्रविष्ट चित्‌ भी चित्तवृत्ति मे स्थित विकल्पों से रहित होकर सैकड़ों पदार्थो मेँ समानरूप से गिरती है