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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 34, Verse 99

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 34, verse 99 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 34 · श्लोक 99

संस्कृत श्लोक

भावेनाभावमाश्रित्य भावस्त्यजति दुःखताम् । प्रेक्ष्य भावमभावेन भावस्त्यजति दुष्टताम् ॥ ९९ ॥

हिन्दी अर्थ

भेदसंकल्पकला के त्याग का उपाय कहते हैं। चित्त से वाचारम्भण श्रुति द्वारा, "नेति नेति" इत्यादि श्रुति द्वारा और आचार्योपदेश, स्वविचार आदि से भी सब दृश्य के अभाव का आश्रय कर वह चित्तरूप भाव शोक, मोह आदि के परिणामरूप दुःखता का तुरन्त त्याग करता है। फिर भी राग आदि के संस्कारों की दुष्टता से समयान्तर में शोक आदि की पुनः उत्पत्ति हो सकती है, अतएव सर्वदृश्यप्रतिषेधरूप अभाव से परमार्थ सद्‌ अद्वैतानन्दस्वभाव आत्मा का दर्शन कर वह चित्तरूप भाव राग आदि दुष्टता का भी त्याग कर देता है, क्योकि "रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते" एसा भगवान्‌ का वचन है, इसलिए बीज (राज आदि ) के अभाव से भेद-संकल्पकला का त्याग सिद्ध हो जाता है, यह अर्थ है