Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 34, Verses 111–112
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 34, verses 111–112 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 34 · श्लोक 111,112
संस्कृत श्लोक
कुतः किलास्याः शुद्धाया अविच्छिन्नामलाकृतेः ।
चन्द्रिकाया रुचः कोष्णाः कलङ्काः कलनाश्चितः ॥ १११ ॥
आत्मनेऽस्तु नमो मह्यमविच्छिन्नचिदात्मने ।
लोकालोकमणे देव चिरेणाधिगतोऽस्यहो ॥ ११२ ॥
हिन्दी अर्थ
केवल सत्यज्ञान से इष्टानिष्ट कल्पनारूप मृगतृष्णा का कैसे नाश हो सकता है ? ऐसा यदि कोर्ड
कहे, तो उस पर उसके असत् होने से ही उसकी शान्ति होती है, ऐसा कहते हैँ ।
चाँदनी की मन्दोष्ण एवं कलंकयुक्त (काली) छवि की तरह निरन्तर निर्मल आकारवाली इस
शुद्धचित् की कल्पनाएँ कहाँ से हो सकती है ? अब अखण्डवाक्यार्थ का साक्षात्कार कर अखण्ड
वाक्यार्थरूप से स्थिति प्राप्त हुए अत्यन्त दुर्लभ आत्मा को प्रेम से नमस्कार करते हैँ । हे लोगों के
ज्ञानप्रकाश में हेतुभूत मणिरूप, हे देव, आप चिरकाल मेँ प्राप्त हुए हो अविच्छिन्न चिदात्मरूप मुझ
आत्मा को नमस्कार है