Guru's AddaGuru's Adda

Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 96

53 verse-groups

  1. Verse 1एक का विनाश होने पर दूसरे का विनाश होता है, इसमें उपपत्ति दर्शा रहे श्रीवसिष्ठजी उपसंहार…
  2. Verse 2श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : ब्रह्मन्‌, मन जड़ होता हुआ भी अजड के सदृश आकृतिवाला है, उसका संक…
  3. Verse 3श्रीवसिष्ठजी ने कहा : रघुवर, सर्वशक्तिशालिनी माया से शबलित असीम आत्मतत्त्वका पहले रचित सं…
  4. Verse 4लोगों के आधुनिक व्यवहार में भी मन का रूप प्रसिद्ध है, ऐसा कहते हैं । यह खम्भा है या पुरुष…
  5. Verse 5आत्मा के चिद्रूप होने के कारण सदा भासित होने पर भी मैं आत्मा को नहीं जानता यह प्रतीति ओर…
  6. Verse 6स्पन्दरहित (निष्क्रिय) मन में इस लक्षणकी अव्याप्ति की आशंका कर कहते है । इस लोक में जैसे…
  7. Verse 7जैसे परस्पर भिन्न हुए अग्नि ओर उष्णता का अस्तित्व नहीं रह सकता वैसे ही भिन्न हुए कर्म ओर…
  8. Verses 8–9एकमात्र संकल्परूप विविध विस्तार से शोभित होनेवाले फलजनक चित्तरूपी कर्म ने स्वयं ही इस नान…
  9. Verse 10जैसे यहाँ पर स्थित ही एेन्दवों ने हम लोग सत्य लोकमें स्थित हैं, ऐसी कल्पना की थी वैसे ही…
  10. Verse 11उस वासनारूपी वृक्ष का कर्म बीज है, मन की गति शरीर है ओर सुखदुःख आदि फल देनेवाली विविध क्र…
  11. Verse 12यदि कोई कहे कि कर्म कर्मेन्धियो का वृक्तिरूप है, वह मनसे कैसे हो सकता है ? तो इस पर कहते…
  12. Verses 13–14मन ही सर्वेन्द्रियता को धारण करता है, इसलिए यह दोष नहीं है, यह दशति हुए मनके नामों को दिख…
  13. Verse 15अकस्मात्‌ अपने स्वरूप का विस्मरण होने से जिसे अपने अपरिच्छिन्न दृष्टापन का (चिदेकरसता का)…
  14. Verse 16बाह्य कल्पना में उन्मुख चित्‌ में प्रवृत्तिनिमित्त के भेद से योगरूढ़ि से पूर्वोक्त मन, बु…
  15. Verse 17इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजी के प्रश्न करनेपर क्रमशः पूर्वोक्त पन्द्रहों नामों की व्याख्या क…
  16. Verse 18॥ उक्त शुद्ध चेतन जब पहले ही या विकल्प के बाद विशेष भावना प्राप्त कर उक्त विकल्पकी दो कोट…
  17. Verse 19जब तुच्छ देह आदि में आत्माभिमान करने से अपनी सत्ता मानता है, तब अभिमान से “अहंकार' कहा जा…
  18. Verse 20जब वह शुद्ध चेतन पूर्वापर के अनुसन्धानका त्यागकर बालक की नाई एक विषय का त्यागकर दूसरे विष…
  19. Verse 21चूँकि कर्ता एकमात्र स्पन्दधर्म से युक्त होता है, अतः जब उक्त शुद्ध चेतन ही वास्तवमें असत्…
  20. Verse 22काकतालीय न्याय से (अकस्मात्‌) अन्य वस्तु के लिए अवकाश से रहित अपने स्वरूप के ज्ञानका त्या…
  21. Verse 23जब शुद्ध चेतन जो पहले देखा गया हो अथवा न देखा गया हो, उसकी "पहले मैंने इसे देखा है” इस नि…
  22. Verse 24जब शुद्ध चेतन तिरोभूत हुई पद, पदार्थ ओर उनकी शक्तियों के स्वरूप से शून्यप्राय अति सूक्ष्म…
  23. Verse 25जब शुद्ध चेतन अविद्यारूप कलंक से युक्त होने के कारण उत्पन्न हुई दूसरी दृष्टि (प्रपंचप्रती…
  24. Verse 26*विस्मृतिर्मलमेव च“ इस पाठ में दो नामों का साथ ही व्याख्यान करते हैं। जब शुद्ध चेतन आत्मस…
  25. Verse 27अथवा मिथ्या विकल्पों से विविध प्रकार के विक्षेप करता है, अतः विस्मृति कहलाता है। आवरणशक्त…
  26. Verse 28अलक्षित परमात्मा में सम्पूर्ण दुश्यजाल की उपादन से अभिन्न कर्ताङूप से रचना करता है, अतएव…
  27. Verses 29–30जब वह शुद्ध चेतन सत्‌ को शीघ्र असत्ता को प्राप्त करता है ओर असत्‌ को (देहादि को) प्रमाणसत…
  28. Verse 31संसार और उसकी बीजरूपता को प्राप्त हुआ वह शुद्ध चेतन दर्शन, श्रवण, स्पर्श, रसन, प्राण आदि…
  29. Verses 32–33चित्तरूपता को प्राप्त हुए अतएव प्रस्तुत संसारपद को पहुँचे हुए शुद्ध चेतनके अपने ही सैंकड़…
  30. Verses 34–35एक ही शुद्ध वेतन के मन, बुद्धि आदि संख्याभेदो की कल्पना कैसे हुई ? इस पर कहते हैं । चूँकि…
  31. Verse 36वह जीव कहा जाता है, इस कथन से मने चेतनताकी प्राप्ति होने से अन्य दर्शने ओर लोकमें भी उसकी…
  32. Verse 37श्रीवसिष्टजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, मन न तो केवल जड है और न केवल चेतन ही है । वास…
  33. Verses 38–41मन जैसे चित्‌ ओर अचित्‌ से विलक्षण है वैसे ही वह सत्‌ ओर असरत्‌ से भी विलक्षण है, ऐसा कहत…
  34. Verses 42–43अथवा आत्मा की अज्ञात सत्ता ही मन है, ऐसा कहते है । शाश्वत (अविनाशी) एकरूप निश्चय के बिना…
  35. Verse 44जैसे एक ही मनुष्य रसोई बनाने से पाचक, पढ़ाने से पाठक, गाँवका प्रधान होने से मुखिया यों वि…
  36. Verse 45हे रघुवर, जौ मैंने ये चित्तकी संज्ञाएँ कही हैं, उन्‍्हींको अन्यान्य वादियों ने अपनी सैंकड…
  37. Verse 46अपने-अपने तर्को के अभिमत द्रव्यत्व, गुणत्व आदि बुद्धि का मनमें आरोप कर अपनी इच्छा से उन्ह…
  38. Verses 47–51उनके कल्पनाप्रकारों का विभाग कर दिखलाते हैं। किसी वादी के मत में मन जड़ है, किसीके मत में…
  39. Verse 52सभीका अपनी-अपनी मति के अनुसार परमात्मतत््वनिर्णय ही भावी फल है ऐसा कहते हैं । जैसे अनेक प…
  40. Verses 53–54जैसे पथिक अपनी-अपनी बुद्धि और रूचि के अनुसार (०७) अपने अपने गन्तव्य मार्गकी प्रशंसा करते…
  41. Verses 55–56क्या मुमुश्च पुरुषो के लिए भी उनके द्वारा कही गई युक्तियाँ उपादेय हैं ? इस पर, “नहीं, मुम…
  42. Verses 57–58अपने द्वारा कही गई युक्तियों में लोकानुभवका संवाद दिखलाते हैं। यह सब चित्त ही है, ऐसा सभी…
  43. Verse 59जैसे आलोक रूपप्रकाशों का कारण है, वैसे ही मन > उनकी बुद्धि की विचित्रता यानी भेद ही उक्त…
  44. Verse 60अतएव वादियों को अपनी-अपनी वासना के अनुसार मनमें जाड्य और चैतन्य का अनुभव उत्पन्न होता है…
  45. Verse 61जो यह मन पूर्वोक्त रीति से उत्पन्न हुआ, तत्त्वज्ञ लोग उसे न तो चेतन है और न जड़ है, ऐसा ज…
  46. Verse 62मन के अद्वितीय ब्रह्माकार होने पर संसार का विलय हो जाता है। कलुष जल के सदुश मलिन चिद्रूप…
  47. Verses 63–64"कलुषित जल के समान मलिन चिद्रूप मन“ इस कथन का तात्पर्य कहते है । हे श्रीरामचन्द्रजी, इसलि…
  48. Verses 65–68मन की असत्ता मे जगत्‌ का निरूपण नहीं होता, इसलिए भी जगत्‌ मनोमात्र है, ऐसा कहते हैं। यदि…
  49. Verse 69जैसे एक ही काल ऋतुविशेषों के आविर्भावसे विचित्र आकार धारण करता है, वैसे ही एक ही मन विचित…
  50. Verse 70तकों के स्थिर न होने से उनको सदा संशय ही होगा, व्यवस्थित एक पक्षका निर्णयभेद कैसे होगा ?…
  51. Verse 71यदि कोड कटे कि आपके पक्षे भी तो आपका श्रद्धा जाज्ब हेतु क्यो नहीं है ? ऐसी शंका होने पर य…
  52. Verse 72वादियों का श्रुति में तो आदन है नहीं, इसलिए उनकी अविद्यावश अपनी अपनी भावना ही स्थिर हुई ह…
  53. Verse 73उक्त अर्थ को स्पष्ट करते हुए उपसंहार करते हैं । यह मलिन चेतन ही जीव, मन, बुद्धि, अहंकार इ…