Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 96
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- Verse 1एक का विनाश होने पर दूसरे का विनाश होता है, इसमें उपपत्ति दर्शा रहे श्रीवसिष्ठजी उपसंहार…
- Verse 2श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : ब्रह्मन्, मन जड़ होता हुआ भी अजड के सदृश आकृतिवाला है, उसका संक…
- Verse 3श्रीवसिष्ठजी ने कहा : रघुवर, सर्वशक्तिशालिनी माया से शबलित असीम आत्मतत्त्वका पहले रचित सं…
- Verse 4लोगों के आधुनिक व्यवहार में भी मन का रूप प्रसिद्ध है, ऐसा कहते हैं । यह खम्भा है या पुरुष…
- Verse 5आत्मा के चिद्रूप होने के कारण सदा भासित होने पर भी मैं आत्मा को नहीं जानता यह प्रतीति ओर…
- Verse 6स्पन्दरहित (निष्क्रिय) मन में इस लक्षणकी अव्याप्ति की आशंका कर कहते है । इस लोक में जैसे…
- Verse 7जैसे परस्पर भिन्न हुए अग्नि ओर उष्णता का अस्तित्व नहीं रह सकता वैसे ही भिन्न हुए कर्म ओर…
- Verses 8–9एकमात्र संकल्परूप विविध विस्तार से शोभित होनेवाले फलजनक चित्तरूपी कर्म ने स्वयं ही इस नान…
- Verse 10जैसे यहाँ पर स्थित ही एेन्दवों ने हम लोग सत्य लोकमें स्थित हैं, ऐसी कल्पना की थी वैसे ही…
- Verse 11उस वासनारूपी वृक्ष का कर्म बीज है, मन की गति शरीर है ओर सुखदुःख आदि फल देनेवाली विविध क्र…
- Verse 12यदि कोई कहे कि कर्म कर्मेन्धियो का वृक्तिरूप है, वह मनसे कैसे हो सकता है ? तो इस पर कहते…
- Verses 13–14मन ही सर्वेन्द्रियता को धारण करता है, इसलिए यह दोष नहीं है, यह दशति हुए मनके नामों को दिख…
- Verse 15अकस्मात् अपने स्वरूप का विस्मरण होने से जिसे अपने अपरिच्छिन्न दृष्टापन का (चिदेकरसता का)…
- Verse 16बाह्य कल्पना में उन्मुख चित् में प्रवृत्तिनिमित्त के भेद से योगरूढ़ि से पूर्वोक्त मन, बु…
- Verse 17इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजी के प्रश्न करनेपर क्रमशः पूर्वोक्त पन्द्रहों नामों की व्याख्या क…
- Verse 18॥ उक्त शुद्ध चेतन जब पहले ही या विकल्प के बाद विशेष भावना प्राप्त कर उक्त विकल्पकी दो कोट…
- Verse 19जब तुच्छ देह आदि में आत्माभिमान करने से अपनी सत्ता मानता है, तब अभिमान से “अहंकार' कहा जा…
- Verse 20जब वह शुद्ध चेतन पूर्वापर के अनुसन्धानका त्यागकर बालक की नाई एक विषय का त्यागकर दूसरे विष…
- Verse 21चूँकि कर्ता एकमात्र स्पन्दधर्म से युक्त होता है, अतः जब उक्त शुद्ध चेतन ही वास्तवमें असत्…
- Verse 22काकतालीय न्याय से (अकस्मात्) अन्य वस्तु के लिए अवकाश से रहित अपने स्वरूप के ज्ञानका त्या…
- Verse 23जब शुद्ध चेतन जो पहले देखा गया हो अथवा न देखा गया हो, उसकी "पहले मैंने इसे देखा है” इस नि…
- Verse 24जब शुद्ध चेतन तिरोभूत हुई पद, पदार्थ ओर उनकी शक्तियों के स्वरूप से शून्यप्राय अति सूक्ष्म…
- Verse 25जब शुद्ध चेतन अविद्यारूप कलंक से युक्त होने के कारण उत्पन्न हुई दूसरी दृष्टि (प्रपंचप्रती…
- Verse 26*विस्मृतिर्मलमेव च“ इस पाठ में दो नामों का साथ ही व्याख्यान करते हैं। जब शुद्ध चेतन आत्मस…
- Verse 27अथवा मिथ्या विकल्पों से विविध प्रकार के विक्षेप करता है, अतः विस्मृति कहलाता है। आवरणशक्त…
- Verse 28अलक्षित परमात्मा में सम्पूर्ण दुश्यजाल की उपादन से अभिन्न कर्ताङूप से रचना करता है, अतएव…
- Verses 29–30जब वह शुद्ध चेतन सत् को शीघ्र असत्ता को प्राप्त करता है ओर असत् को (देहादि को) प्रमाणसत…
- Verse 31संसार और उसकी बीजरूपता को प्राप्त हुआ वह शुद्ध चेतन दर्शन, श्रवण, स्पर्श, रसन, प्राण आदि…
- Verses 32–33चित्तरूपता को प्राप्त हुए अतएव प्रस्तुत संसारपद को पहुँचे हुए शुद्ध चेतनके अपने ही सैंकड़…
- Verses 34–35एक ही शुद्ध वेतन के मन, बुद्धि आदि संख्याभेदो की कल्पना कैसे हुई ? इस पर कहते हैं । चूँकि…
- Verse 36वह जीव कहा जाता है, इस कथन से मने चेतनताकी प्राप्ति होने से अन्य दर्शने ओर लोकमें भी उसकी…
- Verse 37श्रीवसिष्टजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, मन न तो केवल जड है और न केवल चेतन ही है । वास…
- Verses 38–41मन जैसे चित् ओर अचित् से विलक्षण है वैसे ही वह सत् ओर असरत् से भी विलक्षण है, ऐसा कहत…
- Verses 42–43अथवा आत्मा की अज्ञात सत्ता ही मन है, ऐसा कहते है । शाश्वत (अविनाशी) एकरूप निश्चय के बिना…
- Verse 44जैसे एक ही मनुष्य रसोई बनाने से पाचक, पढ़ाने से पाठक, गाँवका प्रधान होने से मुखिया यों वि…
- Verse 45हे रघुवर, जौ मैंने ये चित्तकी संज्ञाएँ कही हैं, उन््हींको अन्यान्य वादियों ने अपनी सैंकड…
- Verse 46अपने-अपने तर्को के अभिमत द्रव्यत्व, गुणत्व आदि बुद्धि का मनमें आरोप कर अपनी इच्छा से उन्ह…
- Verses 47–51उनके कल्पनाप्रकारों का विभाग कर दिखलाते हैं। किसी वादी के मत में मन जड़ है, किसीके मत में…
- Verse 52सभीका अपनी-अपनी मति के अनुसार परमात्मतत््वनिर्णय ही भावी फल है ऐसा कहते हैं । जैसे अनेक प…
- Verses 53–54जैसे पथिक अपनी-अपनी बुद्धि और रूचि के अनुसार (०७) अपने अपने गन्तव्य मार्गकी प्रशंसा करते…
- Verses 55–56क्या मुमुश्च पुरुषो के लिए भी उनके द्वारा कही गई युक्तियाँ उपादेय हैं ? इस पर, “नहीं, मुम…
- Verses 57–58अपने द्वारा कही गई युक्तियों में लोकानुभवका संवाद दिखलाते हैं। यह सब चित्त ही है, ऐसा सभी…
- Verse 59जैसे आलोक रूपप्रकाशों का कारण है, वैसे ही मन > उनकी बुद्धि की विचित्रता यानी भेद ही उक्त…
- Verse 60अतएव वादियों को अपनी-अपनी वासना के अनुसार मनमें जाड्य और चैतन्य का अनुभव उत्पन्न होता है…
- Verse 61जो यह मन पूर्वोक्त रीति से उत्पन्न हुआ, तत्त्वज्ञ लोग उसे न तो चेतन है और न जड़ है, ऐसा ज…
- Verse 62मन के अद्वितीय ब्रह्माकार होने पर संसार का विलय हो जाता है। कलुष जल के सदुश मलिन चिद्रूप…
- Verses 63–64"कलुषित जल के समान मलिन चिद्रूप मन“ इस कथन का तात्पर्य कहते है । हे श्रीरामचन्द्रजी, इसलि…
- Verses 65–68मन की असत्ता मे जगत् का निरूपण नहीं होता, इसलिए भी जगत् मनोमात्र है, ऐसा कहते हैं। यदि…
- Verse 69जैसे एक ही काल ऋतुविशेषों के आविर्भावसे विचित्र आकार धारण करता है, वैसे ही एक ही मन विचित…
- Verse 70तकों के स्थिर न होने से उनको सदा संशय ही होगा, व्यवस्थित एक पक्षका निर्णयभेद कैसे होगा ?…
- Verse 71यदि कोड कटे कि आपके पक्षे भी तो आपका श्रद्धा जाज्ब हेतु क्यो नहीं है ? ऐसी शंका होने पर य…
- Verse 72वादियों का श्रुति में तो आदन है नहीं, इसलिए उनकी अविद्यावश अपनी अपनी भावना ही स्थिर हुई ह…
- Verse 73उक्त अर्थ को स्पष्ट करते हुए उपसंहार करते हैं । यह मलिन चेतन ही जीव, मन, बुद्धि, अहंकार इ…