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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 96, Verse 69

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 96, verse 69 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 96 · श्लोक 69

संस्कृत श्लोक

ते हि राम न बुध्यन्ते विशिष्यन्ते न च क्वचित् । सर्वा हि शक्तयो देवे विद्यन्ते सर्वगा यतः ॥ ६९ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे एक ही काल ऋतुविशेषों के आविर्भावसे विचित्र आकार धारण करता है, वैसे ही एक ही मन विचित्र कर्मो के उद्रेक से विचित्र आकार धारण करता हुआ विविध नामों से प्रसिद्ध होता है ॥६ ६॥ यदि मन के सम्बन्ध के बिना अहंकार, इन्द्रिय और क्रियाएँ शरीर को क्षोभित करें, तो जीव आदि मनसे पृथक्‌ हों । वादियों ने किन्हीं-किन्हीं दर्शनोंमें यानी अपने-अपने शास्त्रोंमें मनके जो भेद तर्क से कहे हैं, वे कुतर्क करनेवालों से कहे गयें हैं, प्रामाणिक वेदव्यास आदि द्वारा नहीं कहे गये हैं ॥ ६७, ६ ८॥ उनकी कुतर्क की उत्पत्ति में कारण कहते हैं। हे श्रीरामचन्द्रजी, ये तत्त्वज्ञानी वेदव्यास आदि द्वारा कभी कहींपर न तो कहे गये हैं और न ज्ञात हैं। उक्त कुतर्को की उत्पत्ति में अज्ञान, साम्प्रदायिकशिक्षाशून्यता तथा मनरूपी देव की स्वाभाविक कुतर्कशक्तियाँ कारण हैं, क्योंकि मनमें सब जगह दौड़नेवाली सब शक्तियाँ विद्यमान हैं