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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 96, Verse 52

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 96, verse 52 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 96 · श्लोक 52

संस्कृत श्लोक

अज्ञानात्परमार्थस्य विपरीतावबोधतः । केवलं विवदन्त्येते विकल्पैरारुरुक्षवः ॥ ५२ ॥

हिन्दी अर्थ

सभीका अपनी-अपनी मति के अनुसार परमात्मतत््वनिर्णय ही भावी फल है ऐसा कहते हैं । जैसे अनेक पथिकों का एक ही नगर गन्तव्य होता है, वैसे ही राजस, तामस, मलिनसत्त्व, और अर्धमलिनसत्त्वप्रधान लोगों के योग्य देश और कालमें उत्पन्न हुए उक्त सभी लोगोंका- तत्‌-तत्‌ बुद्धि के अनुसार फलरूप से स्थित होने में समर्थ-पारमार्थिक पद ही गन्तव्य है ॥ ५ १॥ यदि एक ही परम पद प्राप्तव्य है, तो वे परस्पर विवाद किसलिए करते हैं ? इस पर कहते हैं । परम पद में आरूढ़ होने की इच्छा करनेवाले वे परमार्थ वस्तु के अज्ञान से अपरमार्थ वस्तु में (अनात्म वस्तु में) यह परमार्थ है, यों विपरीत ज्ञान होने से विविध विकल्पों से (इदमित्थं इदमनित्थं यों) विवाद करते हैं