Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 96, Verses 57–58
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 96, verses 57–58 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 96 · श्लोक 57, 58
संस्कृत श्लोक
चित्तमेवेदमखिलं सर्वेणैवानुभूयते ।
अचित्तो हि नरो लोकं पश्यन्नपि न पश्यति ॥ ५७ ॥
श्रुत्वा स्पृष्ट्वा च दृष्ट्वा च भुक्त्वा घ्रात्वा शुभाशुभम् ।
अन्तर्हर्षं विषादं च समनस्को हि विन्दति ॥ ५८ ॥
हिन्दी अर्थ
अपने द्वारा कही गई युक्तियों में लोकानुभवका संवाद दिखलाते हैं।
यह सब चित्त ही है, ऐसा सभी लोगों को अनुभव होता है, क्योंकि यदि मनुष्य के चित्त न
हो, तो वह लोक को देखता हुआ भी कुछ नहीं देखता हे । मनयुक्त पुरुष ही भली-बुरी वस्तु
को सुनकर, स्पर्शकर, देखकर, भोजन कर, सूँघकर अन्तःकरणमें हर्ष अथवा विषाद को
प्राप्त होता है, मनरहित नहीं