Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 96, Verses 42–43
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 96, verses 42–43 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 96 · श्लोक 42,43
संस्कृत श्लोक
तस्येमानि विचित्राणि नामानि कलितान्यलम् ।
अहंकारमनोबुद्धिजीवाद्यानीतराण्यपि ॥ ४२ ॥
यथा गच्छति शैलूषो रूपाण्यलं तथैव हि ।
मनो नामान्यनेकानि धत्ते कर्मान्तरं व्रजत् ॥ ४३ ॥
हिन्दी अर्थ
अथवा आत्मा की अज्ञात सत्ता ही मन है, ऐसा कहते है ।
शाश्वत (अविनाशी) एकरूप निश्चय के बिना जो आत्मा की स्थिति है, वह चिति कही
गई है । उससे यह जगत् उत्पन्न हुआ है । म्लानरूपवाली चिति की जो जड़ ओर अजड
दृष्टियों के मध्यमें झूले की नाईं अपनी कल्पना है, वही मन कहा जाता है।
हे श्रीरामजी, चित् का बाहर औपाधिक चलनरूप मलिन और भीतर साक्षिचैतन्य के
आवरणरहित होनेसे अविद्यारूप कलंक से शून्य जो रूप है, वह मन कहा जाता है । वह न जड़
है और न चेतन है, किन्तु जड़ और चेतन से विलक्षण है ॥ ३ ९-४१॥ उसके ये अहंकार, मन,
बुद्धि, जीव आदि तथा अन्य भी विचित्र नाम कल्पित हुए हैं। जैसे नट अनेक विविध रूपों को
प्राप्त होता है वैसे ही मन भी अन्यान्य कर्मो को प्राप्त होता हुआ अनेक नामों को धारण करता
है