Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 96, Verses 13–14
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 96, verses 13–14 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 96 · श्लोक 13,14
संस्कृत श्लोक
मनो बुद्धिरहंकारश्चित्तं कर्माथ कल्पना ।
संसृतिर्वासना विद्या प्रयत्नः स्मृतिरेव च ॥ १३ ॥
इन्द्रियं प्रकृतिर्माया क्रिया चेतीतरा अपि ।
चित्राः शब्दोक्तयो ब्रह्मन्संसारभ्रमहेतवः ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
मन ही सर्वेन्द्रियता को धारण करता है, इसलिए यह दोष नहीं है, यह दशति हुए मनके
नामों को दिखलाते हैं ।
मन, बुद्धि, अहंकार, चित्त, कर्म, कल्पना, संसृति, वासना, विद्या, प्रयत्न, स्मृति, इन्द्रिय,
प्रकृति, माया, क्रिया, केवल इतनी ही नहीं और भी अनेक विचित्र शब्दोक्तियाँ ब्रह्म में कल्पित
हैं। ये शब्दवैचित्रय के सिवा और कुछ भी नहीं हे । संसारमें कल्पित आगे कहे जानेवाले भिन्न-
भिन्न प्रवृत्तिनिमित्त (शब्दों की अर्थवोधनशक्ति के प्रयोजक यानी शक्यताअवच्छेदक) ही
इनके कारण हैं