Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 96, Verse 17
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 96, verse 17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 96 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
गतेव सकलङ्कत्वं कदाचित्कल्पनात्मकम् ।
उन्मेषरूपिणी नाना तदैव हि मनःस्थिता ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजी के प्रश्न करनेपर क्रमशः पूर्वोक्त पन्द्रहों नामों की व्याख्या
करने की इच्छावाले श्रीवसिष्ठजी पहले “मन नामकी व्याख्या करते हैं।
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, अविद्यावश मानों कलंकता को प्राप्त हुआ
परम चेतन ही जब कभी स्फुरण रूप को प्राप्त होकर “यह इस प्रकार का है, या यह इस प्रकार
का नहीं है” यो विकल्परूपसे नाना प्रकार का होता है, तभी वह मनरूपसे स्थित होता है,
इसलिए उसका “मन' नाम होता है