Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 96, Verses 65–68
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 96, verses 65–68 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 96 · श्लोक 65
संस्कृत श्लोक
चित्तादृतेऽन्यद्यद्यस्ति तदचित्तस्य किं जगत् ।
सर्वस्य भूतजातस्य समग्रं प्रविलीयते ॥ ६५ ॥
नानाकर्मवशावेशान्मनो नानाभिधेयताम् ।
एकं विचित्रतामेति कालो नाना यथर्तुमिः ॥ ६६ ॥
यदि नामामनस्कारमहंकारेन्द्रियक्रियाः ।
क्षोभयन्ति शरीरं तत्सन्तु जीवादयः परे ॥ ६७ ॥
दर्शनेषु तु ये प्रोक्ता भेदा मनसि तर्कतः ।
क्वचित्कचिद्वादकरैरपवादकरैः किल ॥ ६८ ॥
हिन्दी अर्थ
मन की असत्ता मे जगत् का निरूपण नहीं होता, इसलिए भी जगत् मनोमात्र है, ऐसा
कहते हैं।
यदि चित्त से पृथक् जगत् नहीं है, तो जिसका चित्त लीन हो गया उसकी दृष्टि से जगत्
क्या है ? यानी कुछ भी नहीं । क्योकि चित्त का लय होने पर सब प्राणियों का सारा जगत् लीन
हो जाता है । इसलिए सम्पूर्ण जगत् चित्तमात्र ही है