Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 96, Verses 53–54
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 96, verses 53–54 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 96 · श्लोक 53
संस्कृत श्लोक
स्वमार्गमभिशंसन्ति वादिनश्चित्रया दृशा ।
विचित्रदेशकालोत्था मार्गं स्वं पथिका इव ॥ ५३ ॥
तैर्मिथ्या राघव प्रोक्ताः कर्ममानसचेतसाम् ।
स्वविकल्पार्पितैरर्थैः स्वाः स्वा वैचित्र्ययुक्तयः ॥ ५४ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे पथिक अपनी-अपनी बुद्धि और रूचि के अनुसार
(०७) अपने अपने गन्तव्य मार्गकी प्रशंसा करते हैं वैसे ही रजोगुणप्रधान, तमोगुणप्रधान,
मलिनसत्त्वप्रधान लोगों के उचित देश, कालमें उत्पन्न हुए वादी भी अपने-अपने पक्ष की
प्रशंसा करते हैं। भाव यह कि उक्त काल आदि का अनुसरण करनेवाले उन लोगों की अपने-
अपने पक्ष में अभिरूचि होती है, अतः वे स्वस्वपक्ष की प्रशंसा करते हैं