Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 96, Verse 72
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 96, verse 72 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 96 · श्लोक 72
संस्कृत श्लोक
अविद्यावशतश्चित्तभावनाः स्थितिमागताः ।
चिति पर्यायशब्दा हि भिन्नास्ते नेह वादिनाम् ॥ ७२ ॥
हिन्दी अर्थ
वादियों का श्रुति में तो आदन है नहीं, इसलिए उनकी अविद्यावश अपनी अपनी भावना
ही स्थिर हुई है कि उन्होने मनके ही नामरूपभेदों की भ्रमसे कल्पना की है ऐसा कहते हैं।
वादियों की अविद्यावश चित्तभावनाएँ स्थिति को प्राप्त हुई हैं यानी वादियोंकी मति श्रुति
से परिशुद्ध नहीं है, इसलिए उन्होंने उक्त अज्ञानके वशवर्ती होकर अपनी अपनी मनोभावना
को ही ठीक या अकाट्य समझा | इसलिए उन्होंने चित्तभावको प्राप्त हुए चैतन्य मेँ भ्रान्तिवश
नाम आदि भेद की कल्पना की है