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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 96, Verse 37

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 96, verse 37 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 96 · श्लोक 37

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । मनो हि न जडं राम नापि चेतनतां गतम् । म्लानाऽजडा तदा दृष्टिर्मन इत्येव कथ्यते ॥ ३७ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीवसिष्टजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, मन न तो केवल जड है और न केवल चेतन ही है । वास्तवमें, संसारदशामें मलिन हुई अजड दृष्टि (चिति ही) मन शब्द से कही जाती है अर्थात्‌ चेतन और जडका संमिश्रणरूप होने से मन चेतन ओर जड इनमें से अन्यतर नहीं हे । परमार्थरूप से तो "मन्वानो मनस्तान्यस्यैतानि कर्मनामान्येव" (मनन करता हुआ मन होता है ये उसके कर्मप्रयुक्त नाम हैं) इत्यादि श्रुति में आत्मा के ही कर्मप्रयुक्त नामों मेँ मनशब्द की गणना से चेतन द्रष्टा ही संसारदशामें उपाधि मलिनता का अनुभव करता है, अतः मन कहा जाता है