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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 96, Verse 27

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 96, verse 27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 96 · श्लोक 27

संस्कृत श्लोक

श्रुत्वा स्पृष्ट्वा च दृष्ट्वा च भुक्त्वा घ्रात्वा विमृश्य च । इन्द्रमानन्दयत्येषा तेनेन्द्रियमिति स्मृतम् ॥ २७ ॥

हिन्दी अर्थ

अथवा मिथ्या विकल्पों से विविध प्रकार के विक्षेप करता है, अतः विस्मृति कहलाता है। आवरणशक्ति की प्रधानता से मल और विक्षेपशक्ति की प्रधानता से विस्मृति कहलाता है, यह भाव है। प्रयत्न: स्मृतिरेव च“ इस पाठ में तो अपने विनाश यानी अदर्शन के लिए स्फुरित होता है यत्न-सा करता है, अतः प्रयत्न कहलाता है और विविध वस्तुओं का स्मरण कराता है; इसलिए स्मृति कहलाता है, यों यथाकर्थाचित्‌ व्याख्या करनी चाहिए। मनःस्वरूप हुआ वह शुद्ध चेतन जब सुनकर, छूकर, देखकर, भोजन कर, सूँघकर, विचारकर यानी श्रवण आदि क्रियाओं से कार्यकारण के स्वामी जीवभाव को प्राप्त हुए परमेश्वर को आनन्दित करता है यानी भोगों द्वारा प्रसन्न करता है, तब वह इन्द्रिय कहलाता है