Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 70
उनहत्तरवाँ सर्ग समाप्त सत्तरवाँ सर्ग कर्कटी का क्रमशः शरीरकी सूक्ष्मतापूर्वक दो सूचिकाओं के रूप में गमनवर्णन और उसका प्राणियों के शरीर में प्रवेश वर्णन ।
49 verse-groups
- Verses 1–4श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, तदुपरान्त पर्वत के शिखर के समान विशाल, कज्जलाका…
- Verses 5–6वह सूक्ष्म लोहविकार होकर तथा अनायसी (रोगरूप) जीवयुक्ता सूचिका होकर शोभित हुई । महाभूत, कर…
- Verse 7मन के मनन से (भावना से) युक्त यह सूची सूर्यकिरणों के भीतर में प्रवेश करने से सुन्दर रत्नस…
- Verse 8वह पवन से उड़ाई गई काजल के मेघ के पिण्ड की लेखा के समान थी, उसके शरीर के अनुरूप छोटे मस्त…
- Verses 9–10सूक्ष्म पुच्छाग्र से अणु (परमाणु के सदृश) मुख की प्रसन्नतापूर्वक वरदान से प्राप्त होनेवाल…
- Verses 11–12टिमटिमाते हुए नेत्रों से दृश्य वह दूर-दूर फैले हुए दीपक की किरणों के समान सूक्ष्म थी, अतए…
- Verse 13उसकी चक्षु आदि इन्द्रियशक्तियाँ प्रत्येक नियत स्थान में स्थित थी, मानों उसका लिंगदेह ही ब…
- Verses 14–15अत्यन्त अलक्ष्य होने के कारण ही मानों वह शून्यवादियों के मत में प्रसिद्ध अर्थो की जननी ओर…
- Verse 16अब सुखोपयोगी न होने से उस कर्कटी नामक राक्षसी के तपस्याफलका उपहास करते हैं । वह कर्कटी जग…
- Verses 17–18उसने जगत् को निगलने का विचार तो किया,पर सूचीरूप तुच्छताका विचार नहीं किया । केवल एकमात्र…
- Verse 19विचार करने योग्य चित्त के रहते उसे पूवापर विचारणा कयो नहीं हुई, इस पर कहते हैं। ईच्छित वि…
- Verse 20स्थूल शरीर को छोडकर सूचीभाव को प्राप्त हुई उस राक्षसीका महामरण भी यानी महादुःख भी सुखरूप…
- Verses 21–22एक वस्तु में अत्यन्त अनुराग करनेवाले लोगों की विषम अवस्था को तो देखिए,राक्षसी ने अपनी इच्…
- Verse 23एक वस्तु में अत्यन्त अनुराग करनेवाले अज्ञानी को अपना नाश भी सुख देता है, सूचिका बनी हुई र…
- Verses 24–27प्रसगप्राप्त नीति का वर्णन कर प्रस्तुत विषय का अनुसरण करते हुए जीवयुक्त सूचिकानामक व्याधि…
- Verses 28–29इस प्रकार उस कर्कटी की दो प्रकार की सूचिकारूप देह उत्पन्न हुई । वह कुहरेरूपी वस्त्र के सद…
- Verses 30–33संकल्प की अघटितघटनार्मे यही द्रष्टान्त है, ऐसा कहते दहै । सभी लोग अपने संकल्प से लघु होते…
- Verses 34–35यदि कोई शंका करे कि तपस्या से पवित्र हुई उस राक्षसी ने दूसरे लोगों को पीड़ा पहुँचानेवाले…
- Verses 36–38इस प्रकार किसी पुरूष में दुर्बुद्धिरूप से हृदय में स्थित होकर तृप्त होती हे ओर किसी पुरुष…
- Verses 39–46उसके तिरोधान का स्थान कहते है । भूमि में वह धूलिकणों से तिरोहित रहती है, हाथ में अंगुलियो…
- Verse 47पीडित लोगों को उच्छ्वसित करनेवाली ओर अन्दर सद्भाव से रहित वह विसूचिका सौभाग्य से हीन ओर क…
- Verse 48सूचिकास्वभाव होने के कारण वह नगरों में और गाँवों में सड़कों और गलियोंमें फेंके हुए यानी अ…
- Verse 49जैसे किसीके द्वारा सीने के लिए हाथ में ली गई चिरकाल तक सीने के लिए पिरोये हुए धागे को मुख…
- Verse 50यदि कोई शंका करे कि सीनेवाले हाथ को ही उस चु ने क्यो नहीं छेदा ? तो इस पर कहते हैं। वह क्…
- Verses 51–52जैसे बड़ी भारी शिला नाव द्वारा इधर उधर ले जाई जाती है, वैसे ही वृद्धावस्था में स्थित आशा…
- Verse 53दूसरों के द्वारा गुँथे गये महीन तागे को अपने मुँह से खाती हुई-सी अतएव दूसरे लोगों के द्वा…
- Verse 54सूचीने पहले भी दूसरे लोगों के वध से होनेवाले उदरपूर्ति की इच्छा से ही तपसे क्लेश को प्राप…
- Verse 55अब सूची द्वारा मूर्खतापूर्वक किया गया तप तागे से गिरे हुए चीथडों को पिरोने के लिए ही हुआ,…
- Verse 56सूची ने अपने उदर की पूर्ति क्यो नहीं की ? इस पर कहते हैं । क्योकि सूची ने तागे के अग्रभाग…
- Verse 57इसलिए उसको बड़ा पश्चात्ताप हुआ, ऐसा कहते हैं । अपनी तपस्या से, जिसने उसके पेट को क्षीण कर…
- Verse 58यदि उसको पश्चाताप हुआ तो क्या वह प्राणियों के विघात से विरत हो गयी ? नहीं, ऐसा कहते हैं।…
- Verse 59अतएव केवल सूची के स्वभाव से होनेवाले कार्यो को भी वह करती ही है, इस प्रकार के पूर्वोक्त अ…
- Verse 60इसलिए वस्त्रो में दर्जी द्वारा वेधपूर्वक चलाई जा रही वह उनके नेत्रके सामने अपने मुख को वस…
- Verse 61किसी समय गले में लटकाये गये दुपट्टे के सूतमें पिरोई गई वह अपने छेदरूपी नेत्र से स्त्रियों…
- Verse 62वह मृदु ओर स्निग्ध कोशेय वस्त्र में तथा कठिन ओर रुक्ष क्षौम वस्त्र में (वल्कल में) तुल्यव…
- Verse 63अँगूठे की अंगुली से दबाई गई ओर लम्बे सूत्र को धारण कर रही वह सूची भीतर न समा रही अँतड़ियो…
- Verse 64सूत में पिरोई गई तीक्ष्ण भी वह सूची सरस ओर निरस सभी पदार्थो में हृदयशून्यतावश विशेष का अव…
- Verse 65अपराध के बिना दण्ड पाने के कारण इसकी दुर्गति को तो देखिए, ऐसा कहते है । निष्ठुर भाषण आदि…
- Verse 66इसकी दुर्दशा होना ठीक ही है, ऐसा कहते है। चूँकि वह सूचिका अपने अपकार के बिना ही दूसरों का…
- Verse 67भाग्यवश सीनेवाले के हाथ से गिरी हुई उसके अथवा किसी दूसरे के हाथ से स्पर्शं करने के अयोग्य…
- Verse 68इसलिए मूर्खो की चित्तवृत्ति के साथ भी संगति उसे अच्छी लगती है, ऐसा कहते हैं। मूढ़ लोगों क…
- Verse 69यदि कोई कटे कि उसकी अन्य लोहयूचियों के साथ भी साम्य होने के कारण, कभी उनके साथ अगर वह लोह…
- Verses 70–72उसका प्राणियों के प्राण आदि वायुओं द्वारा देह के अन्दर संचार होता है, ऐसा कहते हैं। प्राण…
- Verse 73प्रायः कम्बल आदि सीने के समय गडरियों के हाथ में स्थित वह सूचिका कभी उन लोगों के उनके डुकड…
- Verses 74–76पैर में घुसकर रक्तपान के उपार्जन से सन्तुष्ट होती है, फूलों के गुच्छों की माला पिरोने के…
- Verse 77थोड़े से रक्तकर्णो के आस्वाद के लोभ से इसकी दूसरों को मारने में प्रवृत्ति हो सकती है ? इस…
- Verses 78–79वह सूचिका मूढ अपनी आत्मा द्वारा किये जा रहे जीवसूची और लोहसूची इन दो अपनी सूचिकाओं से होन…
- Verses 80–81जैसे मिट्टी में घिसने के बिना चुपचाप रक्खी हुई सुई जंग लगने के कारण मलिन हो जाती है, वैसे…
- Verses 82–84महामुनि को नमस्कार कर सायंकालीन सन्ध्या आदि के लिए स्नानार्थ चली गई, रात्रि समाप्त होने प…