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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 70, Verse 56

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 70, verse 56 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 70 · श्लोक 56

संस्कृत श्लोक

सूत्रांशुनिर्गमे योग्यं सूच्या हृदयमर्जितम् । परपूरणयैवाशु तेजश्च कवितार्करुक् ॥ ५६ ॥

हिन्दी अर्थ

सूची ने अपने उदर की पूर्ति क्यो नहीं की ? इस पर कहते हैं । क्योकि सूची ने तागे के अग्रभाग के भीतर अप्रवेश के योग्य छिद्ररहित (अवकाश रहित) हृदय को तपस्या से प्राप्त किया तथा तत्त्वबोधभाग्यशाली होने के कारण सूर्यकान्ति के समान अभिज्ञता के प्रकाश अपने बुद्धिप्रकाश को भी पट आदि के सीवन से ही व्याप्त किया यानी अपने भोग के लिए अर्जित नहीं किया