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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 70, Verse 50

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 70, verse 50 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 70 · श्लोक 50

संस्कृत श्लोक

वेधनं कर्मसंश्लिष्टा कठिनापि न साकरोत् । न हि तीक्ष्णो बहिः कार्यो निजत्वं विजहाति चेत् ॥ ५० ॥

हिन्दी अर्थ

यदि कोई शंका करे कि सीनेवाले हाथ को ही उस चु ने क्यो नहीं छेदा ? तो इस पर कहते हैं। वह क्रूर होती हुई भी अपने योग्य सीवनरूप कर्म में (सीने में) ही लगी रहती थी, क्योंकि सीना ही सुई का स्वभाव है, अतएव उसने सीनेवाले के हाथ को छेदा नहीं । यदि वह सुई सीनेरूप अपने स्वभाव को छोड़ दे यानी प्रगट न करे, तो अपने क्रूर स्वभाव को भी बाहर प्रगट न कर सकेगी, क्योकि जैसे उसका सीना स्वभाव है, वैसे ही अपने क्रूर स्वभाव को प्रकट करना भी स्वभाव है