Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 70, Verses 78–79
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 70, verses 78–79 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 70 · श्लोक 78 ,79
संस्कृत श्लोक
सूचिकायुग्मलभ्येन मोहितेनात्मना नृणाम् ।
मृतिमाशङ्कते चित्रा स्वार्थे नोदेति मूढता ॥ ७८ ॥
वस्त्रतन्तुविभेदेन परमारणमाशु मे ।
इदं संपद्यत इति भवत्यन्तर्हि निर्मला ॥ ७९ ॥
हिन्दी अर्थ
वह सूचिका मूढ अपनी
आत्मा द्वारा किये जा रहे जीवसूची और लोहसूची इन दो अपनी सूचिकाओं से होनेवाले वेधन
से सब प्राणियों के मरण की तर्कना करती है । मूढ़ों की आवश्यक स्वार्थमें यदि मूढ़ता उदित न
हो, तो वह बड़े आश्चर्य की बात है । यह मेरा परमारणरूप कार्य पहले (वस्त्र सीने के समय)
वस्त्र के तन्तुओंका भेदन करनेसे अभ्यस्त है, इस कारण यह शीघ्र सम्पन्न हो रहा है, इस
प्रकार अपने चातुर्य के अनुसंधान से अपने मन में अत्यन्त प्रसन्न होती है