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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 70, Verse 67

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 70, verse 67 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 70 · श्लोक 67

संस्कृत श्लोक

शेते किंश्याममैत्र्येव दूरे करपरिच्युता । स्वरूपसदृशं मित्रं कस्मै नाम न रोचते ॥ ६७ ॥

हिन्दी अर्थ

भाग्यवश सीनेवाले के हाथ से गिरी हुई उसके अथवा किसी दूसरे के हाथ से स्पर्शं करने के अयोग्य स्थान में कुत्सित श्याम वर्णवाले अधोरोमोके साथ मानों मेत्री प्राप्त कर उनके साथ सोती है, अपने स्वरूप के अनुकूल मित्र किसको अच्छा नहीं लगता