Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 70, Verse 65
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 70, verse 65 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 70 · श्लोक 65
संस्कृत श्लोक
अगर्दती मुखप्रोता सुतीक्ष्णापि च तापिधीः ।
सुवेधिताप्यहृदया राजपुत्र्यापि दुर्भगा ॥ ६५ ॥
हिन्दी अर्थ
अपराध के बिना दण्ड पाने के कारण इसकी दुर्गति को तो देखिए, ऐसा कहते है ।
निष्ठुर भाषण आदि शब्द न करती हुई भी वह मुखमें तागे से गुँथी गई हे । अन्य को
सन्ताप देने में समर्थ होती हुई भी वह स्वयं ही सन्तापयुक्त बुद्धि से युक्त हे, सुवेधिता यानी
छिद्रयुक्त होने पर भी वह हृदयरूपी छिद्र से रहित हे । जैसे कोई राजपुत्री भी अभागिनी हो
जाती है, वैसे ही यह भी अभागिनी हो गई हे