Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 70, Verses 5–6
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 70, verses 5–6 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 70 · श्लोक 5,6
संस्कृत श्लोक
रराज सूचिका कृष्णा सूक्ष्मायसमनायसी ।
पुर्यष्टकेन चलिता व्योमगा व्योमवासिनी ॥ ५ ॥
सूची दृश्यत एवासौ नत्वयो नाम विद्यते ।
संविद्भ्रमकुले चैषा स्वल्पसूचीव लक्ष्यते ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
वह
सूक्ष्म लोहविकार होकर तथा अनायसी (रोगरूप) जीवयुक्ता सूचिका होकर शोभित हुई ।
महाभूत, कर्मेन्द्रिय, ज्ञानेन्द्रिय, प्राण, अन्तःकरण, अविद्या, काम, कर्मके संघातरूप पुर्यष्टक
से चली हुई वह आकाश में जाती थी ओर निवास करती थी, वह सूची तो दिखाई ही देती थी,
पर उसमें लोहा नाममात्र भी नहीं था । अनेक भ्रमं के बीचमें उसका यह स्वल्प-सूचीरूप से
दिखाई देना भी एक प्रकारकी भ्रान्ति ही थी