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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 70, Verse 57

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 70, verse 57 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 70 · श्लोक 57

संस्कृत श्लोक

अकस्मात्तेन रूढेन क्षीणपूरेण रूपिणी । हृदये राक्षसी सूचिः कर्मणा तप्यते च सा ॥ ५७ ॥

हिन्दी अर्थ

इसलिए उसको बड़ा पश्चात्ताप हुआ, ऐसा कहते हैं । अपनी तपस्या से, जिसने उसके पेट को क्षीण कर दिया था, अकस्मात्‌ प्राप्त हुई सूचिरूपता से मूर्तिमती हुई वह सूचिका राक्षसी बड़ा सन्ताप करती थी