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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 70, Verses 30–33

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 70, verses 30–33 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 70 · श्लोक 30,31

संस्कृत श्लोक

सर्वः स्वसंकल्पवशाल्लघुर्भवति वा गुरुः । कर्कट्योग्रं वपुस्त्यक्त्वा सूचीत्वमुररीकृतम् ॥ ३० ॥ तुच्छोऽप्यर्थोऽल्पसत्त्वानां गच्छति प्रार्थनीयताम् । सूचीवृत्तपिशाचीत्वं राक्षस्या तपसा स्थितम् ॥ ३१ ॥ अपि पुण्यशरीराणां जातिबन्धो न शाम्यति । तनुसूचीपिशाचीत्वं राक्षस्या तपसार्जितम् ॥ ३२ ॥ तस्यां दिगन्तभ्रमणे प्रवृत्तायां महानिलैः । तत्रैव सा तनुः स्थूला गलिता शरदभ्रवत् ॥ ३३ ॥

हिन्दी अर्थ

संकल्प की अघटितघटनार्मे यही द्रष्टान्त है, ऐसा कहते दहै । सभी लोग अपने संकल्प से लघु होते हैं और अपने संकल्प से महान्‌ होते हैँ । इसी न्याय के अनुसार संकल्प से ही कर्कटीने अपने भीषण शरीर का त्यागकर सूचीकारूपता का स्वीकार किया | क्षुद्र चित्तवाले लोग तुच्छ पदार्थ की प्रार्थना करते हैं । राक्षसी ने सूची के स्वभाव के तुल्य स्वभाववाले पिशाचीत्व की तपस्या से अभिलाषा की