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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 70, Verses 11–12

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 70, verses 11–12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 70 · श्लोक 11,12

संस्कृत श्लोक

कुञ्चितेक्षणसंदृश्या दीर्घदीपांशुकोमला । सद्यःस्नातसमुत्सन्नबालवालविलासिनी ॥ ११ ॥ तन्तुर्बिसादिवोड्डीना बाह्यसंचारकौतुकात् । ब्रह्मनाडिरिवोद्युक्ता बहीरन्ध्रं सुसुन्दरी ॥ १२ ॥

हिन्दी अर्थ

टिमटिमाते हुए नेत्रों से दृश्य वह दूर-दूर फैले हुए दीपक की किरणों के समान सूक्ष्म थी, अतएव बड़ी एकाग्रता के लिए जिन्होंने अपनी आँखें अत्यन्त संकुचित कर रक्खी थी, ऐसे देखनेवालों की दृष्टि से वह दिखाई देती थी। तुरन्त स्नान करने से पृथक्‌-पृथक्‌ हुए बालकों के केशों के समान उसका विलास था, बाह्य संचार करने के कौतुक से मृणाल को तोड़नेपर उसके बीचसे निकले हुए तन्तु के समान ओर मूलाधार से ब्रह्मरन्ध्र का भेदन कर बाहर निकली हुई सूर्यमण्डलाभिमुख होकर स्थित ब्रह्मनाडी की (सुषुम्ना नाडी की) तरह वह उस समय सुन्दरी प्रतीत होती थी