Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 70, Verses 24–27
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 70, verses 24–27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 70 · श्लोक 24-27
संस्कृत श्लोक
अन्या वभूव लग्ना सा तथा जीवविषूचिका ।
व्योमात्मिका निराकारा व्योमवृत्तिशरीरका ॥ २४ ॥
तेजस्तनुप्रवाहाभा प्राणतन्तुमयात्मिका ।
मूलसंवेदनाकारा चन्द्रार्कांशुकसुन्दरी ॥ २५ ॥
पृथगेवासिधाराभा परमाण्ववलीय सा ।
कौसुमी गन्धलेखेव कला कलनरूपिणी ॥ २६ ॥
पापात्मिका मनोवृत्तिः सो हि तस्यास्तथा स्थिता ।
परप्राणवशादेव परमार्थपरायणा ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
प्रसगप्राप्त नीति का वर्णन कर प्रस्तुत विषय का अनुसरण करते हुए जीवयुक्त
सूचिकानामक व्याधि के स्वरूप का वर्णन करते है ।
लोहमयी सूची से संलग्न जीवयुक्त विसूचिका अन्य सूचिका हुई । वह व्योमात्मिका,
निराकार ओर आकाशके समान सूक्ष्म स्वभावयुक्त लिंग शरीरवाली थी, वह तेज के सूक्ष्म
प्रवाह के समान कान्तिवाली तथा प्राणतन्तु के तुल्य, कुण्डलीनी शक्ति के सदृश तथा सूर्य
ओर चन्द्रमा की छोटी-छोटी किरणों के समान सुन्दरी थी । उस कर्कटी की पापात्मक अतएव
तलवार की धार के सदृश क्रूर मनोवृत्ति लोहमय सूची से पृथक् ही थी | वह फूल की सुगन्ध के
समान अत्यन्त सूक्ष्मरूप से प्राणियों के भीतर प्रवेश कर हिंसादिचातुरी के सम्पादन से मूर्तिमती
होकर जीवरूप से प्रकट होती थी। दूसरे लोगों के प्राणों का अनुसरण कर अपनी परम मनोरथ-
सिद्धि में परायण थी